बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने नई दिल्ली से जिस बेबाकी के साथ दिसंबर में ढाका लौटने का ऐलान किया है, उसने बांग्लादेश की मौजूदा सियासत में तहलका मचा दिया है. उनके इस आत्मविश्वास से साफ संकेत मिल रहे हैं कि बांग्लादेश में पर्दे के पीछे बहुत कुछ पक रहा है और शायद एक बार फिर वहां सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार हो रही है.
कब करेंगी वापसी?
दिल्ली में मीडिया से बात करते हुए शेख हसीना ने कहा कि वह जुलाई-अगस्त की हिंसा और 3,000 पुलिसकर्मियों की हत्या की निष्पक्ष जांच के लिए पूरी तरह तैयार हैं. उन्होंने बांग्लादेश में पनप रहे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों, गिरती अर्थव्यवस्था, बेकाबू महंगाई, धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमलों और मीडिया की आवाज़ दबाने को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया. उन्होंने अपनी पार्टी ‘अवामी लीग’ पर लगे प्रतिबंध को हटाने और लोकतंत्र को बहाल करने की मांग की.
ढाका में मची खलबली
शेख हसीना के इस बयान के तुरंत बाद बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय की तरफ से आई तल्ख प्रतिक्रिया और बौखलाहट यह बताने के लिए काफी है कि वहां की मौजूदा सरकार अंदर से हिली हुई है. इतना ही नहीं, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेताओं में भी दरार दिख रही है. BNP के एक सांसद ने तो अवामी लीग को सहयोगी बताते हुए पार्टियों के विलय तक की पैरवी कर डाली.
उधर आम जनता रोजगार की किल्लत, जबरन वसूली और असुरक्षा से परेशान होकर अब अवामी लीग के दिनों को याद करने लगी है.
छात्रों आंदोलन सोची समझी साजिश
जिस दिन शेख हसीना दिल्ली से संदेश दे रही थीं, उसी दिन ढाका में अराजकता का माहौल था. प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार जिसे ‘जुलाई जन-विद्रोह’ मानती है, पूर्व अंतरिम मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने खुद खुलासा किया कि यह कोई स्वतःस्फूर्त छात्र आंदोलन नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक ‘मास्टरमाइंड’ की सोची-समझी साजिश थी.
अब जिस तरह से अवामी लीग के पक्ष में माहौल बनता दिख रहा है, उससे साफ है कि शेख हसीना का ढाका लौटने का इरादा सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति में एक नए तूफान की आहट है.
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-भारत एक्सप्रेस
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