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भोजपुर का भरत तिवारी एनकाउंटर मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट; सीजेआई को भेजा गया लेटर पिटीशन, न्यायिक जांच के आदेश

बिहार के भोजपुर में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट में लेटर पिटीशन दायर कर स्वतंत्र जांच की मांग की गई है. वहीं, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज की देखरेख में निष्पक्ष न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं.

Supreme Court

बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत पहुँच चुका है. इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकील नरेंद्र मिश्रा ने सीजेआई (CJI) सूर्यकांत को लेटर पिटीशन भेजा है. लेटर पिटीशन में मामले में संज्ञान लेने की मांग की गई है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच, दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग और एनकाउंटर के दौरान मौके पर मौजूद अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है. लेटर पिटीशन में बिहार सरकार से जवाब तलब करने की भी मांग की गई है. लेटर पिटीशन में कहा गया है कि मृतक तिवारी की कोई क्रिमिनल हिस्ट्री नहीं थी, परिजनों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह से गैर-कानूनी है.

रिटायर्ड जज से जांच के आदेश

हालांकि, इसकी न्यायिक जांच हो रही है; बिहार सरकार ने इसका आदेश दिया है. बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शनिवार को न्यायिक जांच का आदेश दिया है. मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ (X) पर पोस्ट कर कहा कि शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में 17 जून को हुई पुलिस मुठभेड़ की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की देखरेख में कराने का निर्णय लिया गया है. इसका उद्देश्य घटना के सभी पहलुओं की निष्पक्षता एवं पारदर्शिता के साथ पड़ताल सुनिश्चित करना है.

एनकाउंटर को लेकर क्या हैं सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस?

एनकाउंटर को लेकर सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस पहले से ही मौजूद हैं. वर्ष 1999 में एक सामाजिक संस्था ‘पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ (PUCL) ने एक याचिका दायर की थी. दायर याचिका में वर्ष 1995 से 1997 के दौरान मुंबई पुलिस द्वारा किए गए एनकाउंटर पर सवाल उठाए गए थे. फर्जी एनकाउंटर को ध्यान में रखते हुए सितंबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा और रोहिंटन फली नरीमन की पीठ ने 16 बिंदुओं का एक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया था.

गाइडलाइंस में कहा गया कि यदि किसी एनकाउंटर के परिणामस्वरूप मौत हो जाती है, तो घटना की प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जानी चाहिए और बिना किसी देरी के इसकी सूचना अदालत को भेज दी जानी चाहिए. सूचनाओं का लिखित रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है. एनकाउंटर के बाद पूरी घटना की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी (CID) से या दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम से करवाना जरूरी है. इसकी मजिस्ट्रियल जांच भी करवाई जानी चाहिए. घटना की सूचना, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) या राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) को बिना किसी देरी के दी जानी चाहिए. मौत की स्थिति में कथित अपराधी/पीड़ित के परिजनों को जितनी जल्दी हो सके जानकारी दी जानी चाहिए. जांच में पुलिस की गलती पाए जाने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ एक्शन लिया जाए या जांच पूरी होने तक उसे निलंबित किया जाए.

कानून में क्या हैं पुलिस के अधिकार?

बता दें कि पुलिस को गोली चलाने का सबसे बुनियादी अधिकार भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 34 से 44 में दिए गए ‘राइट ऑफ प्राइवेट डिफेंस’ (आत्मरक्षा के अधिकार) से निकलता है. ये धाराएं हर नागरिक को यह हक देती हैं कि अगर उसकी खुद की या किसी दूसरे की जान को तुरंत खतरा हो, तो वह हमलावर को जान से मार सकता है; बशर्ते यह तब हो जब खतरा बहुत ज्यादा हो और बचने का कोई रास्ता न हो.

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इसके बाद दूसरा प्रावधान गिरफ्तारी से जुड़ा हुआ है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 43 कहती है कि अगर कोई व्यक्ति किसी गंभीर अपराध का आरोपी है और वह गिरफ्तारी का बलपूर्वक विरोध करता है या भागने की कोशिश करता है, तो पुलिस उसे रोकने के लिए जरूरी कदम उठा सकती है; यहाँ तक कि गंभीर स्थिति में हथियार का इस्तेमाल भी कर सकती है.

48 घंटे में सूचना देना अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस से पहले एनकाउंटर को लेकर एनएचआरसी (NHRC) ने गाइडलाइंस 2010 में जारी की थी. इसके मुताबिक, जब भी कोई पुलिस एनकाउंटर होता है, तो इसकी सूचना तुरंत आयोग को दी जानी चाहिए. अगर सूचना देने में 48 घंटे से अधिक की देरी होती है, तो मान लिया जाता है कि पुलिस ने कुछ छुपाने की कोशिश की है. इसके अलावा, हर एनकाउंटर केस में पोस्टमार्टम डॉक्टरों के एक बोर्ड से कराया जाए.

इतना ही नहीं, आयोग ने कहा कि एनकाउंटर की जांच में पुलिसवालों को पूरी कार्रवाई का विवरण, खुफिया जानकारी का स्रोत और हथियार चलाने की मजबूरी साबित करनी होगी. अगर इसका उल्लंघन करते हुए कोई पुलिसकर्मी पाया गया, तो उसे तुरंत निलंबित कर उसके खिलाफ हत्या का मुकदमा चलाने की सिफारिश की जाती है.



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