सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ यह तय करेगी कि क्या बार में पहले ही 7 साल पूरे कर चुके न्यायिक अधिकारी जिला जज पद पर नियुक्ति के पात्र माने जाएंगे. सीजीएआई बी आर गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ 23 सितंबर को सुनवाई करेगी.
संविधान पीठ ने यह साफ किया है कि 23 सितंबर और 24 सितंबर को सात साल के अनुभव को आधार मानकर चलने वाले प्रस्ताव का समर्थन करने वाले वकील अपनी दलीलें रखेंगे. जबकि 24 और 25 सितंबर को इसके विरोध करने वाले वकील अपनी दलीलें रखेंगे.
मामला संविधान के अनुच्छेद 233 (2) से जुड़ा
कोर्ट ने समर्थन करने वाले पक्ष के लिए अजय कुमार सिंह नोडल वकील नियुक्त किया है. वही विरोधी पक्ष की ओर से जॉन मैथ्यू को नोडल वकील नियुक्त किया है. यह मामला संविधान के अनुच्छेद 233 (2) की व्याख्या से जुड़ा है. इसमें कहा गया है कि जिला जज बनने के लिए व्यक्ति को बार में कम से कम 7 साल का वकालत का अनुभव जरूरी है.
अब सवाल यह है कि यह अनुभव केवल आवेदन या नियुक्ति के समय ही देखा जाना चाहिए? या फिर कोई ऐसा न्यायिक अधिकारी भी पात्र होगा, जिसने बार में पहले ही सात साल का अनुभव पूरा कर लिया हो और बाद में न्यायिक सेवा में शामिल हुआ हो?
बता दें कि 12 अगस्त को सीजेआई बी आर गवई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले को संविधान पीठ के पास भेज दिया था. वही दूसरी ओर उपभोक्ता आयोगों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की गई है यह याचिका केरल की एनजीओ परिवर्तन की ओर से दायर की गई है.
याचिका में कोर्ट के दिए फैसले पर पुनर्विचार की मांग
याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की गई है. कोर्ट ने अपने फैसले में उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों (राज्य एवं जिला) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति, पात्रता, चयन और कार्यकाल से संबंधित विस्तृत दिशा निर्देश दिए गए थे. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जिला उपभोक्ता आयोग का अध्यक्ष केवल कार्यरत या सेवानिवृत्त जिला जज ही हो सकता है.
जबकि पहले नियम था कि ऐसा व्यक्ति भी अध्यक्ष बन सकता है जो जिला जज बनने के योग्य हो या कम से कम 7 साल का वकालत का अनुभव हो, वही इसके पात्र हो सकता था. एनजीओ परिवर्तन की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि नए प्रावधान से अनुभवी अधिवक्ताओं को पूरी तरह से बाहर कर दिया गया है, जबकि संविधान के अनुच्छेद 233 (2) के तहत वे जिला जज बनने के लिए योग्य माने जाते हैं.
योग्य अधिवक्ताओं के अधिकारों का हनन
दायर पुनर्विचार याचिका में यह भी कहा गया है कि फैसले के बिना ठोस विश्लेषण के एक आयुक्तिसंगत वर्गीकरण बना दिया है, जिससे योग्य अधिवक्ताओं के अधिकारों का हनन होता है. दायर याचिका में गैर-न्यायिक सदस्यों की पुनर्नियुक्ति के लिए अनिवार्य लिखित परीक्षा की शर्त को भी चुनौती दी गई है. याचिकककर्ता के मुताबिक यह शर्त अनुपातहीन और असंगत है तथा इससे आयोग के कामकाज में निरंतरता बाधित होगी.
याचिका में यह भी कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को व्यापक शक्तियां जरूर देता है, लेकिन वह अदालत को यह अधिकार नहीं देता कि वह नए योग्यता मानदंड तय करें या इसको लेकर कानून बनाने के लिए बाध्य करें.
ऐसा करना विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप है.
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-भारत एक्सप्रेस
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