तीस हजारी कोर्ट.
तीस हजारी कोर्ट 25 साल पुराने मामले में एक आईआरएस अधिकारी के घर पर कथित रेड मामले में दोषी सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर रमनीश और रिटायर्ड एसीपी वी.के पांडेय को सुनाई 3 महीने की सजा सुनाई है. ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास शशांक नंदन भट्ट ने यह सजा सुनाई है. साथ ही कोर्ट ने 50-50 हजार रुपए के निजी मुचलके पर जमानत दे दिया है.
पिछली सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता और पूर्व आईआरएस अधिकारी अशोक अग्रवाल ने कोर्ट को बताया था कि दोषियों ने समझौते के लिए कुछ प्रस्ताव दिया है. समझौते में अशोक अग्रवाल ने इसके लिए बिना शर्ते माफी और मुजावजे कि भी शर्ते रखी है. कोर्ट ने सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर रामनीश गीर और रिटायर्ड अधिकारी वी. के पांडेय दोषी को आपराधिक साजिश रचने, मारपीट और जबरन घर में घुसने के आरोप को सही मानते हुए आईपीसी की धारा 323, 427, 448 और 34 के तहत दोषी करार दिया है. इससे पहले 18 अप्रैल को कोर्ट ने अपने फैसले में वर्ष 2000 में की गई छापेमारी को दुर्भावनापूर्ण और साजिश का हिस्सा बताया था.
कोर्ट ने यह भी माना था कि आरोपितों ने बिना किसी वैध कारण के शिकायतकर्ता के दिल्ली स्थित घर का दरवाजा तोड़ा, जो आपराधिक अतिक्रमण और नुकसान पहुंचाने का स्पष्ट मामला है.
गिरफ्तारी और छापा दुर्भावनापूर्ण मंशा से किया गया- कोर्ट
यह मामला 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल की शिकायत से जुड़ा है, जो उस समय दिल्ली में डिप्टी डायरेक्टर ऑफ एनफोर्समेंट के पद पर कार्यरत थे. 19 अक्टूबर 2000 की सुबह पूर्व आईआरएस अधिकारी अशोक अग्रवाल के घर पर की गई कार्रवाई से जुड़ा है. अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि छापा और गिरफ्तारी दुर्भावनापूर्ण तरीके से की गई थी, जिसका उद्देश्य केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के 28 सितंबर 2000 के आदेश को निष्प्रभावी करना था. उस आदेश में अग्रवाल के निलंबन की समीक्षा चार सप्ताह में करने को कहा था.
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि तलाशी और गिरफ्तारी की कार्रवाई न केवल अवैध थी, बल्कि इसमें शक्ति का दुरुपयोग भी साफ तौर पर नजर आता है. कोर्ट ने माना कि अधिकारियों ने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए एक निर्दोष अधिकारी को परेशान करने की कोशिश की.
जांच प्रक्रिया पर उठा सवाल
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश के बाद दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 25 साल पुराने एक मामले में दस्तावेजों की हेराफेरी और फर्जीवाड़े के मामले में दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज किया था. कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह न्याय के साथ गंभीर अन्याय है कि साल 2000 में दर्ज हुए ऐसे गंभीर आरोपों की पिछले 25 सालों तक जांच नही हो सकी. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए यह भी कहा था कि कभी-कभी जो जांच करते हैं, उन्हें भी जांच का सामना करना चाहिए, ताकि जनता का भरोसा सिस्टम पर बना रहे. कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि इस मामले की जांच एसीपी रैंक के अधिकारी करेंगे. कोर्ट ने तीन महीने में जांच को पूरा करने का आदेश भी दिया था.
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-भारत एक्सप्रेस
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