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न्यायिक अधिकारियों के सेवा नियम को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच बढ़ी तकरार

न्यायिक अधिकारियों की सेवा नियम के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट से साफ शब्दों में कहा है कि वह इस मुद्दे पर कोई हस्तक्षेप न करें.

इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच एक बार फिर तकरार देखने को मिला है. न्यायिक अधिकारियों की सेवा नियम के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट से साफ शब्दों में कहा है कि वह इस मुद्दे पर कोई हस्तक्षेप न करें. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिला न्यायपालिका पर अनुच्छेद 227 (1) के तहत निगरानी का अधिकार हाईकोर्ट के पास है, इसलिए सेवा नियमों का ढांचा तैयार करने का काम भी हाईकोर्ट को ही करना चाहिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा हाईकोर्ट्स को संविधान में तहत उनके अधिकार और कर्तव्यों से वंचित किया जाना चाहिए? अब समय आ गया है कि हाईकोर्ट्स को मजबूत किया जाए, न कि उन्हें कमजोर किया जाए. बात बहुत आगे बढ़ चुकी है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को जिला न्यायाधीशों की भर्ती, सेवानिवृति आयु या प्रमोशन कोटा जैसा मामलों में दखल नहीं देना चाहिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने सैद्धांतिक रूप से एक अवधारणा पत्र को अंतिम रूप दिया था, जिसमें वकालत की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट को वकीलों में से सीधे नियुक्त जिला न्यायाधीशों के लिए भर्ती परीक्षा आयोजित करना चाहिए.

सीजेआई बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जॉयमाल्या बागची की कहा कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की अवधारण अभी भी जीवित है और अगर यह फलीभूत होती है, तो जिला न्यायपालिका के लिए समान सेवा नियम तैयार करने में सुप्रीम कोर्ट की कुछ भूमिका हो सकती है.


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-भारत एक्सप्रेस



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