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प्रेसीडेंशियल रेफरेंस से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने फैसले को रखा सुरक्षित

प्रेसीडेंशियल रेफरेंस से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. 10 दिन तक चली लंबी सुनवाई के बाद संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. संविधान पीठ में सीजेआई बी आर गवई के साथ 4 और न्यायाधीश शामिल है.

Supreme Court
Edited by Vaibhav Gupta

प्रेसीडेंशियल रेफरेंस से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. 10 दिन तक चली लंबी सुनवाई के बाद संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. संविधान पीठ में सीजेआई बी आर गवई के अलावे जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर शामिल है.

सिर्फ राज्यपाल व राष्ट्रपति विधेयकों को दे सकते मंजूरी

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और राज्यपालों की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयक पर फैसला लेने के लिए तय किए गए समय का विरोध किया है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को संविधान की व्याख्या तक सीमित रहना चाहिए और यह राजनीतिक क्षेत्र के हर  मुद्दे का समाधान करने वाला हेडमास्टर नहीं है. महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश एसजी मेहता ने कहा कि सिर्फ राज्यपाल और राष्ट्रपति ही विधेयकों को मंजूरी दे सकता है. कोर्ट विधेयकों को मंजूरी नही दे सकता है.

संविधान ने जानबूझकर इसमें कोई समय-सीमा नहीं रखी

केंद्र सरकार ने अपने लिखित जवाब में कहा है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति का बिलों पर निर्णय लेना उच्च संवैधानिक दायित्व है और इसमें अदालतें सीधे दखल नही दे सकती है. अनुच्छेद 200 और 201 में राज्यपाल और राष्ट्रपति को बिल पर हस्ताक्षर करने, उसे रोकने या राष्ट्रपति के पास भेजने की चार विकल्प दिए गए हैं. जवाब में यह भी कहा गया है कि संविधान ने जानबूझकर इसमें कोई समय-सीमा नहीं रखी है, ताकि वे पूरी संवैधानिक समीक्षा करके निर्णय ले सकें.

वही गोवा और पुड्डुचेरी सरकार द्वारा दायर लिखित जवाब में कहा गया है कि अनुच्छेद 142 (सुप्रीम कोर्ट को मिले विशेष शक्ति) का प्रयोग करके भी अदालतें राज्यपाल की जगह खुद बिल को स्वीकृत नहीं मान सकती. राज्यों के तरफ से यह भी कहा गया है कि अदालत केवल यह घोषणा या अनुरोध कर सकती है कि राज्यपाल को बिल पर निर्णय यथाशीघ्र लेना चाहिए, लेकिन वह खुद राज्यपाल की भूमिका नहीं निभा सकती.

कोर्ट नहीं कर सकता संविधान में संशोधन

जवाब में यह भी कहा गया है कि कोर्ट संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या संविधान निर्माताओं की मंशा को विफल नही कर सकता. बशर्ते कि संविधान पीठ में ऐसी कोई प्रक्रियागत जनादेश न हो. दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे सीजेआई बी आर गवई ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हमें अपने संविधान पर गर्व है. उन्होंने कहा कि देखिए नेपाल में क्या हो रहा है. नेपाल हमने देखा. उन्होंने हिमालयी राज्य में 48 घंटे पहले शुरू हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान 21 लोग मारे जा चुके है और केपी शर्मा ओली को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसपर जस्टिस विक्रमनाथ ने कहा हां बांग्लादेश में भी.

70 सालों में 20 बिलों को नहीं मिली मंजूरी

सीजेआई गवई ने यह टिप्पणी राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए बिल पास करने पर समय तय किये जाने को लेकर की. मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्यपालों से दी जा रही दलीलों के दौरान आंकड़ों के जरिए ये साबित करने की कोशिश कि, पिछले साल 70 सालों में सिर्फ 20 बिल को राज्यपालों की ओर से मंजूरी नहीं दी गई. 90 फीसदी बिल सिर्फ एक महीने में मंजूर किए गए. वही कपिल सिब्बल ने कहा कि 2014 के बाद ऐसे मामले बढ़ गए हैं और उससे पहले ऐसा होता ही नही था.

इसपर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मैं तो आपकी सरकार  की भी तारीफ कर रहा हूं. 1970 के बाद से अब तक डेटा मैन पेश किया है.

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-भारत एक्सप्रेस



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