मानहानि के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बडी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि मानहानि को अपराध की श्रेणी से बाहर करना चाहिए. कोर्ट ने यह टिप्पणी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अमिता सिंह की ओर से दायर मानहानि मामले में कई है.
जस्टिस एम. एम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह टिप्पणी एक ऑनलाइन पोर्टल के खिलाफ दायर मानहानि के मामले में की है. कोर्ट ने अमिता सिंह को फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जनर्लिज्म की याचिका पर नोटिस जारी किया हैं.
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जताई सहमति
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सुंदरेश ने टिप्पणी करते हुए कहा, मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि इन सबको अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया जाए. जिसपर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने भी सहमति जताई है.
बता दें कि 2016 में एक मीडिया पोर्टल ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया था कि प्रो. अमित सिंह 200 पन्नों का डोजियर तैयार करने वाले शिक्षकों के समूह का नेतृत्व कर रही थीं. डोजियर में जेएनयू को संगठित सेक्स रैकेट का अड्डा और देशद्रोही व आतंकवाद समर्थक गतिविधियों का केंद्र बताया गया था.
BNS की धारा 356 में है प्रावधान
रिपोर्ट के मुताबिक यह डोजियर विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंपा गया था, जिसमें आरोप था कि कुछ शिक्षक अलगाववादी गतिविधियों को वैध ठहराते है और जेएनयू में विकृत संस्कृति को बढ़ावा देते हैं. फिलहाल भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 356 में आपराधिक मानहानि का प्रावधान है. यह पहले भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 499 के तहत था.
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2016 में इस प्रावधान को संवैधानिक बताते हुए बरकरार रखा था. उस समय कई राजनेताओं जैसे सुब्रमण्यम स्वामी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल ने इसकी वैधता को चुनौती दी थी.
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-भारत एक्सप्रेस
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