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दिल्ली दंगा केस: उमर खालिद को कड़कड़डूमा कोर्ट से राहत

दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगा मामले के कथित आरोपी उमर खालिद को सप्ताह में दो दिन परिवार से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बात करने की अनुमति दे दी है.

karkardooma court

दिल्ली 2020 दंगा मामले में यूएपीए (UAPA) के तहत जेल में बंद कथित आरोपी और जेएनयू (JNU) के पूर्व छात्र उमर खालिद को दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट से एक बड़ी व्यावहारिक राहत मिली है. विशेष अदालत ने उमर खालिद को जेल से ही सप्ताह में दो दिन अपने परिवार के सदस्यों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए बातचीत करने की आधिकारिक अनुमति दे दी है.

6 साल से नियमों का हो रहा है पालन

इससे पहले, मई महीने में जेल प्रशासन ने एक आंतरिक प्रशासनिक निर्णय लेते हुए उमर खालिद की इस वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा को घटाकर सप्ताह में केवल एक दिन कर दिया था, जिसे खालिद ने अदालत में चुनौती दी थी. कड़कड़डूमा कोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि उमर खालिद पिछले 6 साल से जेल में रहते हुए लगातार इस सुविधा का लाभ उठा रहा है. कोर्ट ने रिकॉर्ड को देखते हुए रेखांकित किया कि इस लंबी अवधि के दौरान उनकी तरफ से जेल मैनुअल या बातचीत के किसी भी तय नियम का कभी कोई उल्लंघन नहीं किया गया है. लिहाजा, उनकी इस सहूलियत को पहले की तरह बहाल किया जाता है.

दिल्ली पुलिस ने दी थी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की दलील

उल्लेखनीय है कि इससे पहले कड़कड़डूमा कोर्ट ने ही उमर खालिद की ओर से दायर नियमित जमानत याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया था. सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने खालिद की ओर से दायर जमानत का अदालत में पुरजोर विरोध किया था. दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए विशेष वकील ने दलील दी थी कि जब तक इस कानूनी पेंच पर किसी बड़ी संवैधानिक बेंच (लार्जर बेंच) से कोई नया स्पष्टीकरण नहीं मिल जाता, तब तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए निष्कर्ष, कड़े निर्देश या रोक पूरी तरह लागू रहेंगे.

सरकारी वकील ने तर्क दिया था कि अगर याचिकाकर्ता को कोई शिकायत, विसंगति या समस्या थी, तो वे सीधे सुप्रीम कोर्ट जाकर इस पर स्पष्टीकरण मांग सकते थे; इसके लिए वैधानिक रूप से सही जगह केवल देश का सर्वोच्च न्यायालय ही था. एक बार जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी केस में अपना स्पष्ट फैसला सुना दिया है, तो यह निचली अदालत उसमें कोई फेरबदल नहीं कर सकती.

7 आरोपियों पर है मास्टरमाइंड होने का आरोप

उमर खालिद और सह-आरोपी शरजील इमाम ने ‘सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम एनआईए’ (Syed Iftikhar Andrabi vs NIA) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में दिए गए एक फैसले का हवाला देते हुए कड़कड़डूमा कोर्ट में अपनी नई जमानत याचिकाएं दायर की थीं. दायर जमानत याचिकाओं में उस कानूनी व्याख्या और दृष्टिकोण पर सवाल उठाया गया था, जिसके आधार पर पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने शरजील इमाम और उमर खालिद की नियमित जमानत याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया था.

गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के अनुसार उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद पर गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न संगीन धाराओं के तहत फरवरी 2020 में भड़के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों का मुख्य मास्टरमाइंड (साजिशकर्ता) होने का गंभीर आरोप है.

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा अवलोकन

पूर्व की अपीलों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी भी गंभीर आपराधिक मामले में जमानत की स्टेज (चरण) बचाव पक्ष के साक्ष्यों के अंतिम मूल्यांकन का मंच नहीं होती है. कोर्ट ने कहा था कि न्यायिक संयम बरतना अपने संवैधानिक कर्तव्य का परित्याग करना कतई नहीं है. विवेक के उचित प्रयोग के लिए न्यायालय को एक व्यवस्थित और प्राथमिक जांच करनी होगी कि क्या पुलिस की जांच और साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया (ऑन द फेस ऑफ इट) आरोपी के खिलाफ अपराध सिद्ध होते हैं? और क्या आरोपी की वास्तविक भूमिका का दंगे या अपराध घटित करने से कोई सीधा व उचित संबंध स्थापित होता है?

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शीर्ष अदालत ने तब स्पष्ट कहा था कि दिल्ली हाई कोर्ट ने कानून के दायरे में ही उनकी जमानत की मांग को ठुकराया है. कोर्ट ने यह भी जोड़ा था कि इस लंबी कानूनी प्रक्रिया से दिल्ली पुलिस की बड़ी साजिश से जुड़ी अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष की कहानी कमजोर नहीं होती है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, उमर खालिद और शरजील इमाम इस पूरे दंगे के केस में अन्य सामान्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से एक बिल्कुल भिन्न (गंभीर) स्थिति में खड़े हैं.

ASG एसवी राजू ने कोर्ट को याद दिलाए थे आंकड़े

कड़कड़डूमा कोर्ट में इस हाई-प्रोफाइल मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट को दंगों की भयावहता याद दिलाई थी. उन्होंने कोर्ट को आधिकारिक तौर पर बताया था कि फरवरी 2020 में भड़के इन भीषण सांप्रदायिक दंगों में कुल 53 बेकसूर लोगों की जान चली गई थी और 700 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल व लहूलुहान हुए थे.



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