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दिल्ली हाईकोर्ट ने किशोर न्याय मामलों में देरी पर जताई चिंता, केंद्र व दिल्ली सरकार समेत कई आयोगों को भेजा नोटिस

दिल्ली हाईकोर्ट ने किशोर न्याय बोर्डों में लंबित मामलों और जेजे अधिनियम के लागू होने में देरी पर चिंता जताते हुए केंद्र, राज्य सरकार और बाल अधिकार आयोगों को नोटिस भेजा.

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Prashant Rai Edited by Prashant Rai

दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) के समक्ष लंबित मामलों की भारी संख्या और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के पूर्ण रूप से प्रभावी क्रियान्वयन में हो रही देरी को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR) और अधिनियम की धारा 16(2) के तहत गठित उच्च स्तरीय समिति को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है.

मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने सभी पक्षों से कहा है कि वे चार हफ्तों के भीतर अपना लिखित जवाब दाखिल करें. साथ ही याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया है कि वह इन जवाबों पर दो सप्ताह के भीतर अपना प्रत्युत्तर (rejoinder) दाखिल करे. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 24 सितंबर की तारीख तय की है.

हाईकोर्ट की किशोर न्याय समिति के समक्ष रिपोर्ट देने के निर्देश

कोर्ट ने याचिकाकर्ता संस्था iProbono India Legal Services को निर्देश दिया है कि वह याचिका में उठाए गए सभी मुद्दों पर 15 दिनों के भीतर एक विस्तृत प्रतिवेदन हाईकोर्ट की किशोर न्याय समिति को सौंपे. याचिका में मांग की गई है कि किशोर न्याय बोर्डों के समक्ष लंबित मामलों का जल्द से जल्द निपटारा किया जाए.

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए दिल्ली सरकार के वकील से कहा कि किशोर न्याय अधिनियम को लागू करना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है. अधिनियम के तहत बोर्डों का गठन, उनका संचालन और उनकी समीक्षा राज्य सरकार के ही अधीन है.

याचिका में उठाए गए प्रमुख मुद्दे

याचिका में यह भी कहा गया है कि किशोर न्याय अधिनियम की विभिन्न धाराओं, विशेष रूप से धारा 14 और धारा 15, में निर्धारित जांच और निपटारे की समयसीमा का पालन नहीं किया जा रहा है, जिससे बच्चों के पुनर्वास और सामाजिक पुनः समावेशन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. इससे कानून का मूल उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो गया है.

याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) और मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट (CMM) को, अधिनियम की धारा 16(1) के तहत, हर तीन महीने में बोर्डों में लंबित मामलों की समीक्षा कर उसकी रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए. साथ ही इन रिपोर्टों को न्यायालय की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे.

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-भारत एक्सप्रेस



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