देश में बढ़ती हिरासत में हिंसा और कथित गैर-न्यायिक हत्याओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने गंभीर चिंता व्यक्त की है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि उन्हें लगा था कि हिरासत में हिंसा अतीत की बात हो चुकी है, लेकिन हाल की घटनाओं ने उन्हें इस धारणा पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है. उन्होंने कहा कि भारत में गैर-न्यायिक हत्याओं के मामले बढ़ रहे हैं और यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है.
उत्तर प्रदेश से जुड़े बयान को जंतर-मंतर से जोड़ा
जस्टिस भुइयां ने कहा कि उन्होंने एक आईपीएस अधिकारी की किताब के विमोचन के दौरान इस मुद्दे पर बात की थी. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संदर्भ उत्तर प्रदेश की एक स्थिति से था, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए उनके बयान को जंतर-मंतर से जोड़कर पेश किया गया.
उन्होंने इसे सोशल मीडिया की शरारत बताया. जस्टिस भुइयां ने पुलिस के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए कहा कि कई बार युवा आईपीएस अधिकारियों को प्रदर्शनकरियों पर व्यक्तिगत रूप से हमला करते और उनके चेहरे पर काफी गुस्सा दिखाई देता है.
हाथों से पीटना चिंता का विषय
न्यायाधीश भुइयां ने यह भी कहा कि एक पेशेवर पुलिस अधिकारियों को इतना उत्त्तेजित होने की जरूरत क्यो पड़ती है. उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी को नंगे हाथों से पीटना गंभीर चिंता का विषय है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर ऐसा पुलिस अधिकारी रात के समय किसी आरोपी की हिरासत में रखवाली करे तो वहां क्या स्थिति होगी.
उन्होंने कहा कि पुलिस हिरासत में भेजे जाने को लेकर कई बार न्यायाधीश भी सतर्क रहते हैं और इसके पीछे वजह है. जस्टिस भुइयां ने पुलिस जांच के तरीके पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि अगर किसी आरोपी को अपराध स्थल का पुननिर्माण कराने के लिए पुलिस हिरासत में ले जाना है तो रात 3 बजे ऐसा करने की इतनी गंभीर जरूरत की है. क्या सूर्योदय तक का इंतजार नहीं करना चाहिए था.
जांच की कमियों को छुपाने के लिए शॉर्टकट
जस्टिस भुइयां ने कहा कि कई मामलों में बाद में यह सुनने को मिलता है कि आरोपी ने पुलिस की राइफल छीनने की कोशिश की, झड़प हुई और उसी दौरान गोली चल गई, जिससे आरोपी की मौत हो गई. किसी अन्य मामले में यह बताया जाता है कि आरोपी को ले जाते समय तेज रफ्तार ट्रक ने उसे टक्कर मार दी. उन्होंने एक मामले का जिक्र करते हुए कहा कि आरोपी के अत्यधिक अवसाद में होने की बात कहकर उसके कुएं में कूदने की कहानी भी सामने आती है.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसी घटनाओं को देखकर सही सोच रखने वाले लोगों के मन मे यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या जांच की कमियों को छीपाने के लिए, मुकदमे के संभावित नतीजे को जानते हुए, ऐसे शॉर्टकट अपनाए जा रहे है. उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की संवैधानिक व्यवस्था इस तरह की परिस्थितियों को मंजूरी नहीं देती.
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-भारत एक्सप्रेस
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