महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनाव मामले में महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि स्थानीय निकाय चुनाव के लिए तारीखों की घोषणा अभी तक नही की गई है. इसको लेकर विचार विमर्श चल रहा है. 27 नवंबर को इसकी घोषणा कर सकते हैं. वही याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि अवमानना याचिका की आड़ में वह 6 मई 2025 के आदेश की समीक्षा की मांग कर रहे हैं.
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि नगरपालिकाओं की छोटी इकाइयां हो सकती हैं, उनके लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गई है? सीजेआई ने कहा कि पहले उन्हें अपना होमवर्क पूरा करने दीजिए. वकील ने कहा कि नगर परिषद के चुनाव 2 दिसंबर को हैं. इसपर सीजेआई ने पूछा कि तो यह नगर पंचायत है? वकील ने कहा कि कृपया ध्यान दें कि जहां 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन हो रहा है, वहां चुनाव नही हो सकते. सीजेआई ने स्पष्ट किया कि वो इस पर 27 अक्टूबर को विचार करेगा. सीजेआई ने कहा कि अगर हमें कोई चुनाव सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विपरीत लगता है तो सब कुछ रद्द किया जा सकता है.
वही इंदिरा जयसिंह ने कहा कि इससे केवल जनता का पैसा बर्बाद होगा. इससे पहले कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनाव 31 जनवरी 2026 तक कराने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने महाराष्ट्र के अधिकारियों को इस साल 10 अक्टूबर तक राज्य में परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने का भी निर्देश दिया था. कोर्ट ने कहा था कि 6 मई को दिए गए आदेश का पालन करने में राज्य चुनाव आयोग विफल रहा है.
2486 स्थानीय निकायों का चुनाव लंबित
कोर्ट ने कहा था कि पांच साल में स्थानीय निकाय के चुनाव करवाना संवैधानिक कर्तव्य है. 2486 स्थानीय निकायों के चुनाव लंबे समय से लंबित है और कोई भी चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं है. क्या यह कानून और नियमों का उल्लंघन नही है. महाराष्ट्र में स्थानीय चुनाव में ओबीसी आरक्षण को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया था. कोर्ट ने चार माह में चुनाव सम्पन्न कराने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि ओबीसी समुदायों को आरक्षण उसी कानून के अनुसार दिया जाएगा, जैसा कि आयोग की 2022 की रिपोर्ट से पहले महाराष्ट्र में था.
सिर्फ कुछ वर्गों को आरक्षण क्यों?- सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि उचित मामलों में विस्तार की मांग की जा सकती है. कोर्ट ने कहा था कि जमीनी स्तर की लोकतंत्र को रोका नहीं जा सकता है. मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि रेलगाड़ी के डिब्बे की तरह आरक्षण हो गया है, जो इसमें चढ़ गए हैं, वे दूसरों को आने नहीं देना चाहते है. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि क्यों कुछ ही वर्ग के लोगों को आरक्षण मिलना चाहिए? बाकी लोगों को आरक्षण क्यों नहीं मिलना चाहिए, जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े हैं. यह राज्यों की जिम्मेदारी है कि इस पर विचार करें.
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-भारत एक्सप्रेस
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