दिल्ली के उप राज्यपाल वीके सक्सेना की ओर से दाखिल आपराधिक मानहानि मामले में दोषी करार दी गई नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को साकेत कोर्ट से झटका लगा है. कोर्ट ने मेधा पाटकर के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है. यह वारंट अदालती आदेश के उल्लंघन करने के मामले में साकेत कोर्ट ने जारी किया है.
कोर्ट ने पाटकर को दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना द्वारा दायर मानहानि मामले में प्रोबेशन बॉन्ड जमा करने के लिए कहा था. लेकिन ऐसा न करने पर कोर्ट ने यह वारंट जारी किया है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल सिंह ने मेधा पाटकर को एक साल के लिए प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दिया है. अतिरिक्त सेशन जज विशाल सिंह ने यह भी कहा कि वह उन पर लगाया गया 10 लाख रुपए का जुर्माना नहीं भरेंगी, लेकिन उन्हें सक्सेना को एक लाख रुपए का मुआवजा देना होगा.
अधिकतम सजा देने की की थी मांग
मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली के उप राज्यपाल ने साकेत कोर्ट में अपना जवाब दाखिल कर कहा था कि मेधा पाटकर को आत्मसमर्पण करने का निर्देश देना चाहिए. साथ ही एलजी ने कहा था कि मेधा पाटकर की याचिका सुनवाई योग्य नही है, उसे खारिज कर देना चाहिए. क्योंकि मेधा पाटकर ने अपनी याचिका में हस्ताक्षर नही किया है.
जिसपर कोर्ट ने मेधा पाटकर से अपील की कॉपी पर हस्ताक्षर के साथ जज की आधिकारिक ईमेल पर मेल भेजने को कहा था.बता दें कि मेधा पाटकर के खिलाफ दिल्ली के उप राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने वर्ष 2001 में आपराधिक मानहानि का मुकदमा किया था. उस समय वे अहमदाबाद स्थित एनजीओ नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के प्रमुख थे.
मेधा पाटकर को सजा देने के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान उपराज्यपाल वी.के सक्सेना के वकील ने उन्हें अधिकतम सजा देने की मांग की थी. वही दूसरी ओर पाटकर के वकील ने कहा था कि उन्होंने समाज के लिए बहुत काम किया है. उन्हें कई अवार्ड मिले है. उनकी उम्र काफी हो गई है, लिहाजा अच्छे आचरण को देखते हुए उन्हें रिहा कर दिया जाए. सक्सेना ने पाटकर के खिलाफ 25 नवंबर 2000 को अहमदाबाद की एक अदालत में मानहानि का शिकायत किया था और उसमें पाटकर की एक प्रेस नोट का हवाला दिया था.
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-भारत एक्सप्रेस
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