Paper Leak Case: देशभर में लगातार हो रहे पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट दो सप्ताह बाद सुनवाई करेगा. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ मामले में सुनवाई कर रही हैं. दायर याचिका में केंद्र और सभी राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई है कि पेपर लीक मामलों की समयबद्ध जांच और त्वरित सुनवाई के लिए एक समान स्टैंडर्ड इन्वेस्टिगेशन प्रोसीजर तैयार करने की मांग की गई है.
संपत्तियों की जब्ती की मांग
साथ ही पेपर लीक के मास्टरमाइंड और उनके परिवार की संपत्तियों की जांच कर उन्हें जब्त करने, मनी लॉन्ड्रिंग, बेनामी संपत्ति और भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों के तहत कार्रवाई करने तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई है. यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर की गई है. अनुच्छेद 32 के तहत दायर जनहित याचिका में देशभर के पेपर लीक मामलों की निश्चित समय सीमा के भीतर जांच कराने की मांग की गई है.
याचिका में क्या कहा गया?
दायर याचिका में कहा गया है कि साल 2026 में हुए नीट पेपर लीक सहित पिछले कई वर्षों में सामने आई इस तरह की घटनाओं ने लाखों छात्रों के भविष्य को अधर में लटका दिया है. दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि पेपर लीक उनके पूरे परिवार को मानसिक, आर्थिक और सामाजिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है. इतना ही नही परीक्षा में हुई धांधली की वजह से देश के कई राज्यों से मासूम उम्मीदवारों की आत्महत्या किए जाने की दर्दनाक खबरे भी आई है.
मेडिकल के स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश की परीक्षा नीट के पेपर लीक का जिक्र करते हुए, याचिका में कहा गया है कि इस घटना ने सिस्टम की कमियों को उजागर किया है. याचिकाकर्ता के अनुसार कानून में कई कमियां हैं, जिनके कारण असली मास्टरमाइंड कानून के शिकंजे से बच निकलते है. इसमें समयबद्ध जांच ट्रायल का प्रावधान नही है, जांच के लिए कोई मानक प्रक्रिया तय नहीं है, अपराध से अर्जित संपत्ति की पहचान और जब्ती की प्रभावी व्यवस्था नही है तथा संगठित गिरोहों तक पहुचने के लिए आधुनिक जांच तकनीकों का उपयोग भी नही किया जा रहा.
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मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की बात
दायर याचिका में कहा गया है कि मौजूदा स्थिति देश के हर नागरिक संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है. जब एक अयोग्य छात्र की जगह पैसे दम पर नकल करने वाले आगे बढ़ जाते हैं, जो पुरे सिस्टम की नाकामी को दर्शाता है.
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010) फैसले पर भी पुनर्विचार की मांग की गई है. इसमें कहा गया है कि आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के विकास को देखते हुए पॉलीग्राफ, ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफ़ाइल जैसे डिकटेंशन टेस्ट पर लगी रोक की समीक्ष की जानी चाहिए. ताकि पेपर लीक करने वालो असली सरगनाओं यक पहुचा जा सके.
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-भारत एक्सप्रेस
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