Supreme Court Case: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में 40 साल से लंबित हत्या के मामले की निपटारे में हो रही देरी पर चिंता व्यक्त की है. जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ए. एस चंदूरकर की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि यह स्थिति परेशान करने वाली है. कोर्ट ने सवाल उठाया कि हाई कोर्ट में जस्टिस डिलीवरी सिस्टम में बाधा डाल रहे पेंडेंसी को कम करने के लिए कौन से नए उपाय अपनाए जा सकते हैं.
सभी अभियोजन अपीले खारिज
दायर अपील में निचली अदालत द्वारा दी गई सजा और आजीवन कारावास को चुनौती दी गई थी. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे और वकील जोहेब हुसैन से पूछा कि न्याय व्यवस्था में बाधा को दूर करने के लिए हाई कोर्ट में सुनवाई में तेजी लाने के लिए क्या किया जा सकता है? दवे ने कहा कि एक तरीका यह है कि तीन दशकों से लंबित सभी अभियोजन अपीलों को खारिज कर दिया जाए.
इसपर कोर्ट ने असहमति जताते हुए कहा कि न्यायनिर्णय के बुनियादी सिद्धांत केवल लंबे समय से लंबित होने के कारण मामले को खारिज करने की अनुमति नहीं देते हैं और यह कोई नहीं जानता कि यदि अभियोजन पक्ष की अपीलें अदालत को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना खारिज कर दी जाती है तो जनहित को कितना नुकसान होगा.
भाई की गोली मारकर हत्या
यह मामला विजय सिंह से जुड़ा है, जो 28 साल के थे जब उन्हें नवंबर 1983 में अपने भाई की कथित गोली मारकर हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. कानपुर की एक सेशन कोर्ट ने उन्हें हत्या का दोषी ठहराते हुए दिसंबर 1985 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई.
इलाहाबाद हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती
जिसके बाद विजय सिंह ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती दी, लेकिन उनकी अपील लगभग 41 साल तक लंबित रही. जिसके बाद 9 फरवरी को हाई कोर्ट ने उनकी अपील को खारिज कर दिया. जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. जिसपर कोर्ट ने यह चिंता व्यक्त की है. दायर अपील में कहा गया था कि वह अब72 साल के है. चार दशकों से अधिक समय से, युवावस्था, मध्य आयु और वृद्धावस्था में वह दोषसिद्धि की साया में जी रहे है.
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-भारत एक्सप्रेस
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