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शिवसेना पार्टी सिंबल मामला:जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि देश की राजनीतिक पार्टियां हमेशा चुनाव मोड़ में रहती हैं

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना पार्टी सिंबल विवाद मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सभी पक्षकारों से कहा कि यह तय कर लें कि कौन कितनी देर दलीलों को पेश करेगा.

Edited by Vaibhav Gupta

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना पार्टी सिंबल विवाद मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सभी पक्षकारों से कहा कि यह तय कर लें कि कौन कितनी देर दलीलों को पेश करेगा. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ 21 जनवरी 2026 को सुनवाई करेगी.

चुनाव चिन्ह से जुड़ा मामला

मामले की सुनवाई के दौरान ठाकरे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने कहा कि एक मामला चुनाव चिन्ह से जुड़ा है और दूसरा अयोग्यता से. उन्होंने कहा कि स्थानीय निकाय चुनाव जल्द शुरू होने वाले हैं. इसलिए मामले में जल्द सुनवाई कर ली जाए, क्योंकि चुनाव चिन्ह का आवंटन होना है. वहीं शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि कई चुनाव पहले ही हो चुके हैं.

इस पर कामत ने कहा कि ये अवैध रूप से चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल जारी रखना चाहते हैं. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि देश की राजनीतिक पार्टियां हमेशा चुनाव मोड़ में रहती हैं. वहीं कोर्ट ने मामले में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से दायर अवमानना याचिका को वापस लेने की अनुमति दे दी हैं. उद्धव ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

बहुमत के परीक्षण के आधार पर निर्णय लिया

पिछली सुनवाई के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट के 2023 के संविधान निर्णय पर भरोसा कर रहे हैं, जिसमें कहा गया था कि विधायी बहुमत को यह तय करने के लिए मानदंड के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि कौन-सा गुट असली पार्टी है. उन्होंने कहा था कि चुनाव आयोग ने केवल विधायी बहुमत का परीक्षण के आधार पर निर्णय लिया.

बता दें कि 2022 में शिवसेना के दो फाड़ हो गया था. शिवसेना में फूट पड़ने के बाद चुनाव आयोग ने शिवसेना और धनुष-बाण का चुनाव चिन्ह एकनाथ शिंदे को दे दिया था. दायर याचिका में ठाकरे ने दलील दी कि चुनाव आयोग इस बात को समझने में विफल रहा है कि याचिकाकर्ता को पार्टी के कार्यकर्ताओं और कार्यकर्ताओं से भारी समर्थन हासिल है.

इसके अलावा याचिका में यह भी कहा है कि चुनाव आयोग के पैरा 15 के तहत विवादों के तटस्थ मध्यस्थ के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहा है और उसने अपनी संवैधानिक स्थिति को कमजोर करने का काम किया है.

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-भारत एक्सप्रेस



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