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बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 को रद्द करने से संबंधित दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार सहित अन्य को नोटिस जारी कर मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 को लेकर याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है. याचिकाकर्ता ने मंदिर के उचित प्रबंधन और नियंत्रण के लिए बौद्ध समुदाय को अधिकार देने की मांग की है. विवाद का केंद्र गया जिला मजिस्ट्रेट के पदेन अध्यक्ष बनने के प्रावधान और धार्मिक पहचान का मुद्दा है.

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 को रद्द करने से संबंधित दायर याचिका पर नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. साथ ही कोर्ट ने याचिका को पहले।से लंबित याचिका के साथ टैग कर दिया है. जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने केंद्र सरकार सहित अन्य को नोटिस जारी किया है. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि इस तरह की याचिका पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. यह याचिका बिहार के गया जिले स्थित महाबोधि मंदिर के उचित प्रबंधन, नियंत्रण और प्रशासन की मांग की गई है.

पदेन अध्यक्ष बनने का प्रावधान विवादित

बता दे कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट एक अन्य याचिका पर सुनवाई से इनकार कर चुका है. याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि यह अधिनियम संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई मुद्दा उठाने के लिए हाई कोर्ट उपयुक्त जगह है. याचिका में बौद्धों की आस्था और धार्मिक अधिकारों का सम्मान करते हुए महाविहार का प्रबंधन बौद्धों को सौपने की मांग की गई थी. 1949 के बोधगया मंदिर अधिनियम ने बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति की स्थापना की, जिसमें चार बौद्ध और चार हिंदू सदस्य शामिल हैं, और गया जिला मजिस्ट्रेट इसके पदेन अध्यक्ष हैं. ऐतिहासिक रूप से अधिनियम में यह प्रावधान था कि अध्यक्ष हिंदू होना चाहिए, जिसे 2013 में संशोधित कर गैर-हिंदू जिला मजिस्ट्रेट को भी अध्यक्ष बनाने की अनुमति दी गई.

हालांकि अखिल भारतीय बौद्ध फोरम जैसे बौद्ध समूहों का कहना है कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 25, अनुच्छेद 26, अनुच्छेद 29 और अनुच्छेद 30 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक मामलों को बिना किसी बाधा के प्रबंधन करने का अधिकार सुनिश्चित करता है.

ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि

अधिवक्ता आनंद जोंधले के अनुसार यह मामला सिर्फ कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि अरबों-खरबों के घोटाले और बौद्ध विरासत की लूट से जुड़ा है. महाबोधि मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक 13वीं शताब्दी तक मंदिर का प्रबंधन बौद्ध धर्म मानने वालों के हाथ में था. लेकिन तुर्क आक्रमणकारियों के आगमन के बाद और 1590 में घमंडी गिरी नाम के एक सन्याशी के गया पहुचने तक इसका प्रबंधन किसके हाथ में था इसका पता नहीं चल पाया है.

बता दें कि महंत घमंड गिरी ने बोधगया मठ की स्थापना की. इसके बाद यह एक हिंदू मठ बन गया. गिरी के वंशज आज भी महाबोधि मंदिर के प्रबंधन में शामिल हैं. वो इसे एक हिंदू धार्मिक स्थल बताते है. वो गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का 9 वां अवतार मानते हैं.

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भारत एक्सप्रेस



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