2003 The Hindu Controversy: अभिव्यक्ति की आजादी और राज्य विधानसभाओं के विशेषाधिकारों के बीच कौन बड़ा है? इस दशकों पुराने कानूनी पहेली पर सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ ने फिलहाल विराम लगा दिया है. लगभग 22 साल पुराने इस हाई-प्रोफाइल मामले की फाइल को कोर्ट ने यह कहते हुए बंद कर दिया कि अब इसमें सुनवाई का कोई औचित्य नहीं रह गया है.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली 7 जजों की पीठ ने पाया कि जिस प्रस्ताव को लेकर यह पूरा विवाद खड़ा हुआ था, उसे तमिलनाडु विधानसभा काफी पहले ही वापस ले चुकी है.
इस पीठ में जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस पीके मिश्रा, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस विपुल पंचोली, जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे. हालांकि, कोर्ट ने इस मामले से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों पर कोई अंतिम राय नहीं दी है.
क्या था 2003 का मामला?
बात साल 2003 की है, जब अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ के तत्कालीन संपादक एन. रवि समेत कई वरिष्ठ पत्रकारों के खिलाफ तमिलनाडु विधानसभा ने विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पारित किया था. विधानसभा ने अपनी अवमानना के आरोप में पत्रकारों को 15 दिन जेल की सजा सुना दी थी. इस अप्रत्याशित कदम के खिलाफ पत्रकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां अदालत ने सजा पर तुरंत रोक लगा दी थी.
इसके बाद 2004 में तमिलनाडु विधानसभा ने अपना वह फैसला और सजा का प्रस्ताव खुद ही वापस ले लिया. सुनवाई के दौरान जब यह बात कोर्ट के संज्ञान में लाई गई, तो बेंच ने माना कि अब विवाद की मुख्य वजह ही खत्म हो चुकी है, इसलिए याचिका को आगे खींचने का कोई मतलब नहीं है.
सवाल जो आज भी है अनसुलझा
यह मामला कानूनी लिहाज से बेहद खास था क्योंकि इसमें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली नागरिक की ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और अनुच्छेद 194 के तहत विधानसभाओं को मिलने वाले ‘विधायी विशेषाधिकार’ आमने-सामने थे.
बड़ा सवाल यह था कि क्या जनप्रतिनिधियों का विशेषाधिकार आम जनता और मीडिया के मौलिक अधिकारों पर भारी पड़ सकता है? अतीत में सुप्रीम कोर्ट के ही दो अलग-अलग फैसलों में इस पर विरोधाभासी राय रही है. चूंकि अदालत ने केस खारिज कर दिया है, इसलिए यह कानूनी बहस भविष्य के लिए फिर खुली रह गई है.
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-भारत एक्सप्रेस
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