वक्फ संशोधित कानून 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज की सुनवाई पूरी हो गई है. इस मामले में मुश्लिम पक्ष के तरफ से कल दलीलें रखी जायेगी. उसके बाद केंद्र सरकार अपना पक्ष रखेगी.
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि जो तीन मुद्दे चिन्हित किया गया है, सिर्फ उन्हीं मुद्दे पर सुनवाई होनी चाहिए. जिसका मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इसका विरोध किया और कहा कि पिछली सुनवाई में कोर्ट कह चुका है कि अंतरिम रोक कैसे हो इसपर सुनवाई होगी. जिसका समर्थन करते हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि टुकड़ों में सुनवाई नही होनी चाहिए.
सीजेआई बी. आर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई कर रही हैं. मामले की सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा कि वक्फ अल्लाह को को दिया गया दान है, जिसे बदला नहीं जा सकता है. उन्होंने कहा कि मस्जिद में मंदिरों की तरह चढ़ावा नही होता, उनके पास हजार या दो हजार करोड़ नहीं है. जिसपर सीजेआई ने कहा कि मैं दरगाह गया, चर्च गया हर किसी के पास चढ़ावे का पैसा है. सिब्बल ने कहा कि पहले, हालांकि संपत्ति को एक प्राचीन स्मारक के रूप में संरक्षित किया था, लेकिन संपत्ति की पहचान वक्फ होने से नहीं बदली और सरकार को हस्तांतरित हो गई.
अब ऐसी वक्फ संपत्ति शून्य हो जाएगी और एक बार वक्फ शून्य हो जाने पर लोगों को प्रार्थना करने से रोक दिया जाएगा. धार्मिक गतिविधि को स्वतंत्र रूप से करने के अधिकार पर रोक लगा दी गई है. सिब्बल ने कहा कि 1954 के बाद वक्फ कानून में जितने भी संशोधन हुए, उनमें वक्फ प्रॉपर्टी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य था. कोर्ट ने पूछा कि क्या वक्फ बाय यूजर में भी पंजीकरण अनिवार्य था?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपके अनुसार 1954 से पहले उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ का पंजीकरण जरूरी नहीं थी और 1954 के बाद यह जरूरी हुआ. कोर्ट ने पूछा कि क्या वक्फ प्रॉपर्टी एएसआई के अधीन आने से धर्म का पालन का अधिकार छीन जाता है. कोर्ट ने कहा कि खजुराहो को एक मंदिर एएसआई के संरक्षण में है, फिर भी लोग वहां जाकर पूजा प्रार्थना कर सकते है. सिब्बल ने कहा कि नया कानून कहता है कि अगर कोई संपत्ति एएसआई संरक्षित है तो यह वक्फ नहीं हो सकती है.
सिब्बल ने कहा कि कोई सरकार को क्यों दिखाए की वह एक मुसलमान है, इसका फैसला कौन करेगा और वह 5 साल तक का इंतजार क्यों करें. यह अनुच्छेद 14, 25 और 26 का उल्लंघन है. सिब्बल ने कहा वक्फ कानून इस तरह से बनाया गया है कि वक्फ की संपत्ति बिना किसी प्रक्रिया का पालन किए छीन ली जाए. अगर मैं मरने वाला हूं और मैं वक्फ बनाना चाहता हूं तो मुझे यह साबित करना होगा कि मैं मुसलमान हूं. यह असंवैधानिक है.
इस पर सीजेआई गवई ने कहा कि संसद द्वारा पारित कानून में संवैधानिकता की धारणा होती है. कोर्ट तब तकहस्तक्षेप नहीं कर सकते जब तक कि कोई स्पष्ट मामला न आ जाए, खासकर वर्तमान स्थिति में हमें इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नही है.एसजी तुषार मेहता जिन तीन मुद्दों पर सुनवाई की बात कर रहे है उसमें पहला मुद्दा उन संपत्तियों को.वक्फ के रूप में घोषित करने से जुड़ा है, जिन्हें या तो वक्फ बाय यूजर के माध्यम से वक्फ घोषित किया गया था. वक्फ बाय यूजर का मतलब है कि ऐसी संपत्तियां जो लंबे समय से वक्फ संपत्ति के रूप में इस्तेमाल हो रही हैं, भले ही कोई लिखित वक्फ डीड या औपचारिक दस्तावेज न हो. ऐसी संपत्तियों को लंबे समय से इस्तेमाल होने के आधार पर वक्फ माना जाता है.
याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाया गया दूसरा मुद्दा राज्य वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना से संबंधित है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पदेन सदस्य के अलावा, केवल मुसलमानों को ही इन निकायों का प्रबंधन करने की अनुमति दी जानी चाहिए. उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड और परिषद में सिर्फ मुस्लिम सदस्य होने चाहिए. तीसरा तर्क एक प्रावधान है जिसमें कहा गया है कि यदि कलेक्टर जांच करता है कि कोई संपत्ति सरकारी भूमि है या नही, तो ऐसी संपत्ति को जांच के दौरान वक्फ संपत्ति नही माना जाएगा.
सिब्बल ने कहा कि योजना से पता चलता है कि आप हमें हर पहलू से बाहर रखना चाहते हैं. मैन धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम दिए हैं, यहां तक कि पदेन सदस्यों को भी हिंदू होना चाहिए. सिब्बल ने कहा कि आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु एक्ट, काशी विश्वनाथ मंदिर एक्ट सभी में पदेन सदस्य हिंदू हैं.
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