Sabarimala Case: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है. संविधान पीठ ने कहा कि हिंदू धर्म असल मे एक वे ऑफ लाइफ यानी जीवन जीने का एक तरीका है. और आस्था साबित करने के लिए मंदिर जाने की जरूरत नही है. यह टिप्पणी जस्टिस बीवी नागरत्ना ने की जिसपर सीजेआई सूर्यकांत ने सहमति जताई.
सीजेआई ने कहा कि अपनी आस्था साबित करने के लिए घर के अंदर दिया जलाना काफी है. सुप्रीम कोर्ट के 9 सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और विभिन्न समुदायों की धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों पर सुनवाई कर रही है. इनमें सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला और दाउदी बोहरा समुदाय से जुड़े मुद्दे भी शामिल है. 15 वे दिन सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता के वकील डॉक्टर मोहन गोपाल ने कहा कि धार्मिक समुदायों के भीतर से सामाजिक न्याय की मांग उठ रही है.
धार्मिक आस्था और अनुष्ठानों की अनिवार्यता पर सवाल
उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म को पहले एक धार्मिक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया था और बाद में 1966 में एक फैसले में कहा गया कि हिंदू वह है, जो धर्म और दर्शन से जुड़े सभी मामलों में वेदों को सर्वोच्च मानता है. उन्होंने मुझसे कभी नहीं पूछा. हममें से किसी ने भी ऐसा कभी नहीं कहा. उन्होंने यह भी कहा कि मेरा वेदों के प्रति अत्यंत आदरभाव है, लेकिन क्या यह सच है कि आज हिंदू कहलाने वाला हर व्यक्ति आध्यात्मिक और दार्शनिक मामलों में वेदों को सर्वोच्च मानता है. उनकी दलील का जवाब देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इसलिए हिंदुत्व को जीवनशैली कहा जाता है. हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या कोई अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है.
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हो सकता है कि किसी को कर्मकांडी होने की जरूरत नहीं है और आस्था रखने वाले लोगों के रास्ते में कोई बाधा नही बन सकता. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट यह कह चुका है कि अगर लोग संवैधानिक अदालत में धर्म से जुड़ी मामलों या प्रत्येक धार्मिक रिवाजों पर सवाल करना शुरू कर दंगे तो सैकड़ो याचिकाएं आ जाएगी और इसकी वजह से धर्म टूट जाएगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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