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सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में मदरसों की सीलिंग पर राज्य व केंद्र सरकार को जारी किया नोटिस, जानें क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में अवैध मदरसों की सीलिंग के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कार्रवाई असंवैधानिक है और छात्रों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है.

madrasas sealed in dehradun

उत्तराखंड सरकार द्वारा मरदसों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, उत्तराखंड सरकार सहित अन्य को नोटिस जारी किया है. साथ ही कोर्ट ने याचिका को मूल याचिका के साथ टैग कर दिया है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल से कहा कि आप हाई कोर्ट क्यों नहीं जा रहे है.

सिब्बल ने कहा कि इससे संबंधित याचिका सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही लंबित है. लिहाजा इस याचिका पर भी सुनवाई कर ली जाए. उत्तराखंड सरकार ने अभी तक 136 मदरसे जांच में बिना मान्यता और रजिस्ट्रेशन के पाए जाने के बाद सील कर दिए गए हैं. ज्यादातर अवैध मदरसे उधम सिंह नगर, देहरादून और हरिद्वार जिले पाए गए है. जिसके खिलाफ जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.

हाईकोर्ट जाने की सलाह पर कपिल सिब्बल ने दी सफाई

राज्य सरकार द्वारा की जा रही इस कार्रवाई को असंवैधानिक और अवैध बताते हुए कहा कि यह छात्रों के मौलिक अधिकारों का हनन है, क्योंकि वे अपनी धार्मिक शिक्षा जारी नहीं रख पा रहे हैं.

उत्तराखंड मदरसा बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का पालन करते हुए इन कोर्सो को समाप्त करने का निर्णय लिया है. उत्तराखंड में कुल 415 मदरसे पंजीकृत हैं, जहां 46000 से अधिक छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं. इन मदरसों में शिक्षण स्तर को तीन चरणों में विभाजित किया है. पहला है तहतानिया, जिसका मतलब होता है, प्राइमरी स्तर. फौकानिया होता है, जूनियर हाई स्कूल और आलिया होता है हायर सेकेंडरी स्तर

शिक्षा के अधिकार कानून के दायरे से बाहर हैं मदरसे

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे अच्छी शिक्षा नहीं पा रहे हैं एनसीपीसीआर का कहना है कि मदरसे राइट टू एजुकेशन एक्ट के दायरे में नहीं आते, जिससे इन बच्चों को स्कूलों जैसी शिक्षा नहीं मिल पाती. आरटीआई एक्ट के तहत स्कूलों में बच्चों को मिड डे मील, यूनिफॉर्म और अच्छे शिक्षक मिलते हैं, लेकिन मदरसों में ये सुविधाएं नहीं है.

एनसीपीसीआर का मानना है कि इससे मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित है. मदरसे को आरटीआई से बाहर रखा गया है. ऐसे में मदरसा में पढ़ने वाले बच्चे न सिर्फ क़्वालिटी एजुकेशन से वंचित हो रहे हैं, बल्कि औपचारिक शिक्षा से भी वंचित हो रहे है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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