यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में 4 सप्ताह बाद होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में दलबदल कानून की व्याख्या को लेकर दायर नई याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है. कोर्ट उस याचिका पर यह नोटिस जारी किया है, जिसमें संविधान की दसवीं अनुसूची की उस व्याख्या को चुनौती दी है, जो विधायकों को राजनीतिक पार्टी के विलय के जरिए दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य होने से बचने की इजाजत देती है.
जस्टिस पी.एस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह नोटिस जारी किया है. मामले की सुनवाई के दौरान दलबदल कानून के मद्देनजर जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि दसवीं अनुसूची के तहत जो कुछ हुआ है, वह हम भी देख रहे है. इसमें बहुत सारी दिक्कतें है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि आर्टिकल 32 के तहत याचिका क्यों दायर की गई है. इसपर सिब्बल ने कहा कि पॉलिसी पर इसके बहुत बड़े असर होंगे, गोवा का मामला अभी लंबित है. कोर्ट ने कहा कि ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें आम तौर पर सदन में या फिर पॉलिटिकल पार्टी के सामने उठाया जाना चाहिए.
10 वी अनुसूची का मकसद इस प्रक्रिया को रेगुलेट करना है. 10वी अनुसूची के कामकाज में जो कुछ हुआ है, वह हम देख ही रहे हैं, इसमें बहुत सारी दिक्कतें है. सिब्बल ने कहा कि यह पूरी तरह से धोखाधड़ी है. इसपर नरसिम्हा ने कहा कि इसे किसने बनाया? इसे संसद सदस्यों ने बनाया है और विधायकों की समस्याओं पर फैसला उन्हें ही करना है.
दसवीं अनुसूची की व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टता की मांग
पिछली सुनवाई में सिब्बल ने कहा था कि इसी तरह का एक मामला, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा शिवसेना के 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में विलय को मान्यता देने के फैसले को चुनौती दी गई है. उन्होंने अनुरोध किया था कि उनकी याचिका को भी उसी मामले के साथ सूचीबद्ध किया जाए, क्योंकि उनकी याचिका समान कानूनी मुद्दों से जुड़ी है, लेकिन इसमें दलबदल कानून की व्याख्या और संसद की संरचना पर व्यापक संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं. उधर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी गई है.
इसमें लोकसभा अध्यक्ष द्वारा शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मान्यता देने के फैसले को चुनौती दी गई है. दलबदल कानून क्या है- आया राम गया राम वाक्यांश भारतीय राजनीति में 1967 में लोकप्रिय हुआ जब हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक ही दिन में तीन बार दल बदला. दलबदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) को राजनीतिक दलबदल रोकने हेतु 1985 में 52वें संशोधन जोड़ा गया.
नामांकन को होने के बाद दल परिवर्तन से रोक के लिए दलबदल विरोधी कानून पेश किया गया था. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना कि सरकार में स्थिरता बनी रहे, ताकि अधिकृत प्रतिनिधि जिस पार्टी से संबंधित हो, उसके प्रति निष्ठा बनी रहे.
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-भारत एक्सप्रेस
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