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कार्रवाई से पहले जज साहब का इस्तीफा: अब नहीं मिलेंगी पेंशन और सरकारी सुविधाएं?

Supreme Court: हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए बीच में इस्तीफा देने वाले जजों और संवैधानिक अधिकारियों के रिटायर्ड फायदों पर रोक लगाने की मांग उठी है. सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.

सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह की रिहाई याचिका मामले में सुनवाई 3 सप्ताह के लिए टाली.

सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह की रिहाई याचिका मामले में सुनवाई 3 सप्ताह के लिए टाली. (PC: भारत एक्सप्रेस)

Edited by Shubhra Rai

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें संवैधानिक अधिकारी (जज सहित) पद से हटाए जाने से बचने के लिए लिए इस्तीफा दे देते है. उन्हें सेवानिवृत्ति के फायदे और अन्य लाभ न दिए जाएं. दायर याचिका पर सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की बेंच ने यह नोटिस जारी किया है. कोर्ट 17 सितंबर को मामले में सुनवाई करेगा.

भारत के संविधान का मूल ढांचा है

हालही में नकदी प्रकरण में फंसे जस्टिस वर्मा ने भी कार्रवाई से बचने के लिए पद से इस्तीफा दे दिया था. यह याचिका मुंबई के रहने वाले प्रतीक वीरा ने वकील संग्राम सिंह, आर. भोसले के माध्यम से दायर की गई है. दायर जनहित याचिका में ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों द्वारा तय कार्यकला पूरा होने से पहले इस्तीफा देने से जुड़े एक बड़े संवैधानिक मुद्दों को उठाया गया है. दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि इस्तीफे के बाद भी संवैधानिक अधिकारियों को अपने पद से जुड़े वही फायदे और सुविधाएं मिलती रहती है. इस तरह की प्रथा को खत्म करना जरूरी है, क्योंकि यह संवैधानिक भावना के खिलाफ है और सीधे तौर पर कानून के शासन के विपरीत है, जो भारत के संविधान का मूल ढांचा है.

कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देने पर सरकारी सुविधाएं बंद कर दी जाए

याचिका में यह भी मांग की गई है कि अगर कोई अधिकारी अपने कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देता है तो उसे मिलने वाली सरकारी सुविधाएं बंद कर दी जाए. कानून के अनुसार अगर कोई संवैधानिक अधिकारी एक निश्चित कार्यकाल के लिए चुने या नियुक्त किए जाते हैं, उनपर अपना कार्यकाल पूरा करने और अपने पद से जुड़ी जिम्मेदारियों को निभाने की संवैधानिक बाध्यता होती है, जब तक कि उन्हें संविधान में बताई गई प्रक्रिया के तहत हटाया न जाए. जनहित याचिका में कहा गया है कि पद से हटाए जाने या अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया से बचने के लिए बीच में ही इस्तीफा देना, ऊंचे पद से हटाने से जुड़े संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मकसद को खत्म करता है. यह जनहित याचिका पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफे के बाद अहम माना जा रहा है.

मामला दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर

यह मामला सामने आने के बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था. वर्मा ने लोकसभा में हटाने की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था. याचिकाकर्ता के अनुसार कानून में यह तय है कि भारत के माननीय राष्ट्रपति को छोड़कर, जिन पर महाभियोग लगाया जा सकता है, दूसरे संवैधानिक अधिकारों को कानून के तय प्रक्रिया के तहत हटाया जाता है, संवैधानिक पदों पर बैठे जजों के मामले में जज जांच अधिनियम के तहत विचार किया जाता है, जबकि दूसरे संवैधानिक अधिकारियों को हटाने के लिए दूसरी प्रक्रियागत जरूरतों पर विचार किया जाता है.

जनहित याचिका में ऐसे नियम बनाने की मांग की गई है जो इस्तीफा देने या रिटायर होने के बाद मिलने वाले फायदों को उन संवैधानिक पद के अधिकारियों पर लागू ने करें जो अपने पद से हटाए जाने की कार्यवाही से बचने के लिए इस्तीफा देते है.

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-भारत एक्सप्रेस



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