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‘HC ने CEC रिपोर्ट की गलत व्याख्या की…’, 93 बजरी खनन लीज मामले में सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान सरकार की दलील

राजस्थान में 93 बजरी खनन लीजों को रद्द करने के हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब मांगा है.

Supreme Court

राजस्थान में 93 बजरी खनन लीजों को रद्द करने के खिलाफ दायर राज्य सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्ष को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. राज्य सरकार ने राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ स्पेशल लीव पिटीशन दायर की है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है.

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और राजस्थान सरकार के महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने हाई कोर्ट के फैसले का विरोध किया. कोर्ट ने खनन लीज धारकों और एलओआई धारकों को खनन संचालन नहीं करने का निर्देश दिया है. कोर्ट जुलाई के तीसरे सप्ताह में इस मामले में अगली सुनवाई करेगा.

हाई कोर्ट के फैसले का विरोध और सरकार की दलीलें

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कोर्ट को बताया कि राजस्थान हाई कोर्ट ने 20 जनवरी 2026 के अपने आदेश में सीइसी (CEC) रिपोर्ट की गलत व्याख्या करते हुए टोंक, भीलवाड़ा, सवाई माधोपुर एवं अजमेर जिलों की 93 ई-ऑक्शन खनन लीजों को रद्द कर दिया. राज्य सरकार का कहना है कि ये सभी लीज साल 2023 की नई एसओपी और संशोधित नियामकीय व्यवस्था के तहत जारी की गई थीं, जिनमें पर्यावरणीय सुरक्षा, रिप्लेसमेंट स्टडी एवं डीएसआर जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं.

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‘पुरानी शर्तें लागू करना गलत’, परियोजनाओं पर प्रभाव

राज्य सरकार ने यह भी कहा कि राजस्थान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले दिए गए आदेशों और सीइसी रिपोर्ट के दायरे का अत्यधिक विस्तार करते हुए नई व्यवस्था पर पुरानी शर्तें लागू कर दी हैं. जबकि वर्तमान में 93 लीजें पूर्व के 82 एलओआई मामलों से पूरी तरह अलग हैं. राज्य सरकार के अनुसार राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश से राज्य में बजरी खनन, राजस्व संग्रहण तथा सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ा है.



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