मिलिट्री ट्रेनिंग के दौरान विकलांग हुए कैडेट्स को बाहर किए जाने और बीमा से संबंधित मामले में लिए गए स्वतः संज्ञान पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि इन कैडेट्स के लिए बीमा, मुआवजा और पुनर्वास जैसी सुविधाएं क्यों नहीं है. जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा की क्या ऐसे कैडेट्स के लिए बीमा योजना शुरू की जा सकती है. कोर्ट 4 सितंबर को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा.
इलाज और सहायता पर जोर
कोर्ट ने सरकार से दिव्यांग हो चुके कैडेट सहायता राशि देने, ईलाज का खर्च उठाने और स्थिति सुधरने पर सेना में उपयुक्त पद देने पर विचार करने को कहा है. साथ ही कोर्ट ने भविष्य में सभी कैडेट को ग्रुप इंश्योरेंस के दायरे में लाने का भी सुझाव दिया है.
बता दें कि कैडेट्स को फिलहाल 40 हजार रुपए तक का सहानुभूति राशि दिया जाता है, जो कि उनकी चिकित्सा जरूरतों के लिए काफी कम है. कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से सहानुभूति राशि बढ़ाने पर विचार करने को कहा है, ताकि घायल कैडेट्स सही इलाज करा सके. यह मामला 12 अगस्त को तब दर्ज किया गया था, जब एक मीडिया रिपोर्ट में इन कैडेट्स के मुद्दे को उठाया गया था.
एनडीए और आईएमए के कैडेट्स प्रभावित
ये कैडेट कभी राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी जैसे देश के शीर्ष सैन्य संस्थानों में प्रशिक्षण का हिस्सा थे. रिपोर्ट के मुताबिक 1985 से लेकर अभी तक 500 सेना अधिकारी कैडेट्स प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग हो चुके है, जिन्हें चिकित्सीय आधार पर बाहर कर दिया गया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अकेले एनडीए में ही लगभग 20 ऐसे कैडेट्स हैं जिन्हें जुलाई 2025 के बीच पांच साल में ही छुट्टी दे दी गई.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एक पूर्व सैनिक का दर्जा पाने के हकदार नहीं है, जिससे वे पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना के तहत सैन्य सुविधाओं के पात्र हो जाते है, जबकि उनकी विकलांगता, अधिकारी के रूप में कमीशन प्राप्त करने से पहले प्रशिक्षण के दौरान हुई थी.
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भारत एक्सप्रेस
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