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‘अंबार नहीं लगाना है…’, सुप्रीम कोर्ट ने मामलों को टैग करने के ईडी के तरीके पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी की कार्यवाही जारी रखने और संपत्ति अटैच रखने पर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने कहा कि मेरिट के आधार पर डिस्चार्ज हुए मामलों को अन्य मामलों के साथ यांत्रिक तरीके से टैग नहीं किया जा सकता.

Supreme Court News

सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से कार्यवाही जारी रखने के प्रयास पर गंभीर सवाल उठाए है. मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि डिस्चार्ज के आदेश को हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है और उसे अब तक चुनौती नहीं दी गई है.

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि मेरिट के आधार पर डिस्चार्ज किए गए मामलों को तकनीकी आधार पर डिस्चार्ज, मामला रद्द होने या समझौते के आधार पर खत्म हुए मामलों के साथ यांत्रिक तरीके से टैग नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन सभी परिस्थितियों में कानूनी स्थिति अलग-अलग हो सकती है.

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत में मामलों में अंबार नहीं लगाना है. किसी मामले को दूसरे मामलों के समूह के साथ टैग करने से पहले यह देखना होगा कि उसमें विचार करने योग्य कोई अलग कानूनी मुद्दा है या नहीं. कोर्ट को यह भी जांचना होगा कि मूल अपराध में डिस्चार्ज का आदेश किन आधारों पर दिया गया था.

मेरिट के आधार पर डिस्चार्ज के आदेश को चुनौती देना जरूरी- जस्टिस बागची

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को मेरिट के आधार पर डिस्चार्ज किया गया है, तो उस आदेश को चुनौती देना जरूरी होगा. मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि आरोपी को 2015 से परेशान किया जा रहा है. उसने कोर्ट को बताया कि इस मामले में डिस्चार्ज मेरिट के आधार पर हुआ था. जिसे हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा और डिस्चार्ज के आदेश के खिलाफ कोई विशेष अनुमति याचिका दाखिल नही की गई है.

वकील ने कोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में पूछा था कि क्या डिस्चार्ज के आदेश को चुनौती दी गई है. लेकिन ईडी ने अपने जबाब में ऐसी किसी चुनौती का उल्लेख नहीं किया. वकील ने यह भी कहा कि मूल अपराध ही समाप्त हो चुका है, इसके बावजूद आरोपी के वर्ष 2015 से मुकदमेबाजी का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि आरोपी की कंपनी 1440 मेगावाट का बिजली संयंत्र चलाती है, जिससे दिल्ली समेत चार राज्यों को बिजली की आपूर्ति होती है.

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि जब मूल मामले में डिस्चार्ज हो चुका है, तो संपत्ति को अब भी अटैच क्यों रखा जाए. वही ईडी की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि मूल अपराध में डिस्चार्ज होने का पीएमएलए की कार्यवाही पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह सवाल सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य बेंच के समक्ष पहले से ही विचाराधीन है. इसलिए मामले को उसी के साथ टैग किया जाना चाहिए. जिसका आरोपी की ओर से पेश वकील ने विरोध किया.

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-भारत एक्सप्रेस



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