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‘युवाओं के भविष्य और करियर को भी देखना होता है’, सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में याचिका ठुकराई

सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ी एफआईआर को रद्द करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने युवाओं के भविष्य का हवाला दिया.

Supreme Court On Sentence Remission Limit Justice Dipankar Datta Remarks

AI IMAGE

सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़ी एफआईआर को रद्द करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है. CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद यह याचिका खारिज कर दी. याचिका में प्रदर्शन के दौरान दर्ज एफआईआर की जांच निष्पक्ष तरीके से कराए जाने की मांग की गई थी.

युवाओं के भविष्य और करियर की चिंता

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि इस मामले में शामिल लोग युवा छात्र हैं. अदालत को उनके माता-पिता और उनके पूरे भविष्य व करियर के बारे में भी सोचना पड़ता है. कोर्ट ने कहा कि हम ऐसा नहीं चाहते कि इन युवाओं को बार-बार मुकदमों के सिलसिले में अदालतों के चक्कर लगाने पड़ें.

संविधान के अनुच्छेद 142 और पूर्व के फैसलों का हवाला

एफआरआर रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल पर उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए सीजेआई ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में कई बार युवा छात्र शामिल होते हैं. कोर्ट ने याद दिलाया कि इससे पहले सांसदों और विधायकों के धरने तथा कोविड-19 महामारी के दौरान हुए प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में भी कोर्ट ने राहत दी थी, क्योंकि संबंधित लोग आदतन अपराधी नहीं थे.

सीजेआई ने कहा कि कोविड महामारी के दौरान देश के लोगों ने ऐसी गंभीर परिस्थितियों का सामना किया था, जिसके लिए वे तैयार नहीं थे और ऐसे हालात में लोगों ने अपनी परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया दी थी.

अदालतों के बेजा इस्तेमाल पर टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने यह भी कहा कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अदालत का हर आदेश सौ फीसदी सही ही हो, लेकिन फैसलों को समझने के लिए उन परिस्थितियों पर भी ध्यान देना चाहिए जिनमें वे आदेश पारित किए जाते हैं. वहीं, वरिष्ठ वकील मैथ्यूज नेदुमपारा ने जनहित याचिकाओं (PIL) को लेकर सवाल उठाते हुए कहा था कि जब कोई वास्तविक पक्षकार नहीं होता, तब जनहित याचिका के जरिए इस तरह की मांगें की जाती हैं जैसे अदालत किसी की निजी संपत्ति हो.

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इस याचिका में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता अभिजीत दिपके को पक्षकार बनाने की मांग भी की गई थी, जिसमें यह कहा गया था कि पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्वतंत्र रूप से काम करती है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तमाम दलीलों को सुनने के बाद इस याचिका पर आगे सुनवाई करने से इनकार कर दिया.



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