पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को 1990 में हिरासत में हुई मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने संजीव भट्ट की ओर से दायर जमानत याचिका को खारिज कर दिया है. जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने उम्रकैद की सजा को निलंबित करने से इनकार कर दिया है.
कोर्ट ने कहा कि इससे अपील की सुनवाई प्रभावित नही होगी. इसमें तेजी लाई जाएगी. कोर्ट 28 फरवरी को भट्ट की ओर से दायर याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था. संजीव भट्ट ने 1990 में हिरासत में यातना और मौत से जुड़े मामले में सुनाई गई उम्रकैद की सजा के मामले में जमानत याचिका दायर की थी. यह मामला 1990 का है, जब भट्ट गुजरात के जामनगर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात थे.
उम्रकैद की सुनाई सजा
30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए निकाली जा रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को रोके जाने के खिलाफ आहूत बंद के बाद जाम जोधपुर शहर में भड़के संप्रदायिक दंगों के दौरान लगभग 150 लोगों को हिरासत में लिया था. इनमें से प्रभुदास वैशनानी नामक व्यक्ति की हिरासत से रिहा किए जाने के बाद अस्पताल में मौत हो गई थी. वैशनानी के भाई ने भट्ट और छह अन्य पुलिस अधिकारियों पर अपने भाई को हिरासत में प्रताड़ित करने और उसकी मौत का कारण बनने का आरोप लगाया था.
इसके बाद आठ पुलिसवालों पर कस्टडी में मौत को लेकर मामला दर्ज किया गया, जिसमें भट्ट भी शामिल थे. जाम नगर जिला अदालत ने प्रवीण सिंह झाला और भट्ट को आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई. जबकि अन्य दोषियों को आईपीसी की धारा 323 और 506 के तहत दोषी करार दिया था. भट्ट को पांच सितंबर 2018 को एक अन्य मामले में गिरफ्तार किया गया था, जिसमें उन पर मादक पदार्थ रखने के लिए एक व्यक्ति को फंसाने के आरोप है.
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-भारत एक्सप्रेस
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