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कैश कांड मामले में कथित आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

कैश कांड से जुड़े मामले में कथित आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है.

कैश कांड मामले में कथित आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की जिरह के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है. कोर्ट ने 12 जनवरी तक सभी पक्षों से लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह निर्देश दिया है. वही जस्टिस यशवंत वर्मा की ओर से पेश वकील ने लोक सभा स्पीकर द्वारा गठित समिति के समझ पेश होने की समय सीमा को बढ़ाने की मांग की. जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया है.

सुनवाई के दौरान वर्मा की ओर से पेश वकील ने कहा कि राज्यसभा के चेयरमैन की अनुपस्थिति में डिप्टी चेयरमैन के अधिकार सीमित है, इसपर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर एक उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जज की नियुक्ति को मंजूरी दे सकते हैं, तो वह नियुक्ति को रद्द भी कर सकती है.

जज और डिप्टी चेयरमैन की भूमिकाएं अलग

जस्टिस वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को बताया कि 1991 का जजेज कानून जज को हटाने की प्रक्रिया की योजना में कहीं फिट नही बैठता है. उन्होंने कहा कि यह कानून सिर्फ सदन के कामकाज को विनियमित करने के लिए हैं. अगर इसे जज को हटाने की प्रक्रिया पर लागू किया गया, तो इससे अव्यवहारिक और हास्यास्पद स्थिति पैदा होगी. रोहतगी ने कहा डिप्टी चेयरमैन, जब तक उन्हें किसी आपात स्थिति में अध्यक्ष के आसन संभालने के लिए नहीं बुलाया जाता, तब तक वे सदन के एक सदस्य ही होते है. इसके विपरीत अध्यक्ष पूरी तरह गैर-पक्षपाती होते है. इसलिए यहां हितों का टकराव है.

उन्होंने कहा कि एक जज की भूमिका डिप्टी चेयरमैन नही निभा सकते. जस्टिस दत्ता ने पूछा लेकिन वो तो निर्वाचित होते है? इसपर रोहतगी ने कहा हां, वे निर्वाचित होते हैं, लेकिन वे सदन के सदस्य होते हैं और सिर्फ आपात स्थिति में ही अध्यक्ष का आसन संभालते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा इतिहास क्या कहता है? जब राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की मौत हुई थी, तो उनके उत्तराधिकारी का चुनाव कब हुआ था? वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि यदि धारा 124 (5) में कुछ मौन है, तो फिर यह कैसे सिद्ध होगा कि 1991 का अधिनियम इसमें शामिल नहीं है? लूथरा ने कहा कि इसका उत्तर सीधा था, नए चेयरमैन के आने तक इस मामले को टाला जा सकता था.

बता दें कि जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव 21 जुलाई को लाया गया था और उसी दिन राज्यसभा के चेयरमैन ने इस्तीफा दे दिया था. जिसके बाद 11 अगस्त को डिप्टी चेयरमैन ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया और 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ने जांच कमेटी बनाने की मंजूरी दे दी.

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-भारत एक्सप्रेस



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