सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर फिलहाल रोक लगा दिया है. जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार को एक व्यक्ति की अवैध हिरासत के लिए 10 लाख रुपए का मुआवजा.देने का आदेश दिया था. इस व्यक्ति को उत्तर प्रदेश पुलिस ने तीन महीने से ज्यादा समय तक गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा था.
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर अपील पर सुनवाई के बाद यह अंतरिम रोक लगाई है. राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है. मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने माना कि पुलिस ने गिरफ्तारी के उचित आधार नही बताए थे, और दोषी अधिकारी को निलंबित कर दिया गया. लेकिन हाई कोर्ट द्वारा लगाए गए इस जुर्माने पर सवाल उठा रही है. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है.
इस बीच याचिकाकर्ता पर 10 लाख रुपए का खर्च लगाने से संबंधित आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक रहेगी. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना था कि उस व्यक्ति की गिरफ्तारी गैर-कानूनी थी क्योंकि पुलिस गिरफ्तारी के लिखित कारण बताने में नाकाम रही, जैसे कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों में जरूरी बताया गया है. कोर्ट ने कहा कि अगर होम डिपार्टमेंट के सबसे बड़े अधिकारी यानी एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (गृह) के तरफ से दिमाग का इस्तेमाल न करने का ऐसा मामला सामने आता है, तो हम अच्छी तरह समझ सकते हैं कि राज्य के दूसरे अधिकारी कैसे काम कर रहे होंगे.
अनुच्छेद 21 और 22(1) के उल्लंघन का दावा
बता दें कि मनोज कुमार को 27 जनवरी 2026 को उन्नाव जिले के असिवन थाने में दर्ज एक मुकदमे में गिरफ्तार किया गया था. याची का आरोप था कि गिरफ्तारी के समय उसे गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी नहीं दी गई, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22 (1) का उल्लंघन है.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य और डॉक्टर राजिंदर राजन बनाम भारत संघ के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में बताना अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है. कुमार को सितंबर 2024 में दर्ज एफआईआर के सिलसिले में 27 जनवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया था.
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-भारत एक्सप्रेस
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