सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिरों को श्रद्धालुओं से मिलने वाला चढ़ावा का इस्तेमाल विवाह हॉल जैसी व्यावसायिक सुविधाओं के निर्माण के लिए नही किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें तमिलनाडु सरकार द्वारा मंदिर निधियों से विवाह हॉल बनाने की योजना को रद्द कर दिया गया था. जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि किराया कमाने के लिए विवाह मंडप बनाना धार्मिक उद्देश्यों की परिभाषा में नहीं आता.
कोर्ट ने यह भी कहा कि श्रद्धालु मंदिर को विवाह मंडप बनाने के लिए धन नहीं देते. इस पैसे का इस्तेमाल मंदिर के सुधार, धार्मिक उद्देश्यों, शिक्षा और चिकित्सा जैसे धर्मार्थ कार्यों के लिए होना चाहिए. कोर्ट 19 नवंबर को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा. तमिलनाडु सरकार ने राज्य के 27 मंदिरों में विवाह हॉल बनाने का प्रस्ताव रखा था, जिसके लिए 80 करोड़ रुपए मंदिर निधि का इस्तेमाल किया जाना था.
सरकार की योजना पर SC ने लगाया रोक
सरकार की दलील थी कि यह योजना हिंदू समाज को किफायती विवाह स्थल उपलब्ध कराने के लिए है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को लाभ होगा. जिसके खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर किया गया था. जिसपर सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मंदिर का पैसा भक्तों के दान और चढ़ावे से आता है. यह पैसा सरकार का नहीं है, बल्कि सिर्फ धार्मिक इस्तेमाल के लिए है. इन पैसों को व्यावसायिक कामों में लगाना अधिनियम (HR/&CE Act 1959) के प्रावधानों का उल्लंघन है.
हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि शादी हॉल किराए पर दिए जाते हैं, यानी इसमें कोई चैरिटी नहीं है. कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया था कि अधिनियम की धारा 66 के अनुसार मंदिर की बची हुई धनराशि को न तो किसी व्यावसायिक गतिविधियों में और न ही लाभ कमाने की योजनाओं में लगाया जा सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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