सुप्रीम कोर्ट ने उच्च चिकित्सा शिक्षा में ट्रांसजेंडरों के लिए आरक्षण की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सीजेआई बी आर गवई ने कहा कि इस न्यायालय का फैसला आरक्षण प्रदान करने के लिए बाध्य करता है, तो आप इससे बंधे हैं. सीजेआई बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ मामले में सुनवाई कर रही है. कोर्ट केंद्र सरकार, देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर जवाब मांग चुका है.
ट्रांसजेंडर डॉक्टरों की ओर से दायर की गई याचिका
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि नालसा मामले के फैसले के अनुसार उच्च चिकित्सा शिक्षा में ट्रांसजेंडरों के लिए आरक्षण है. यह याचिका तीन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की ओर से दायर की गई है. याचिकाकर्ता पेशे से डॉक्टर हैं और जिन्होंने (नीट-पीजी) 2025 के संबंध में 16 अप्रैल के नोटिस और 17 अप्रैल के सूचना बुलेटिन को चुनौती दी है. याचिका में दावा किया गया है कि अधिसूचना शीर्ष अदालत द्वारा 2014 के फैसले में दिए गए निर्देशों के उल्लंघन में जारी की गई थी, क्योंकि इसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से संबंधित आरक्षण की किसी योजना/नीति को रेखांकित नहीं किया गया है.
इससे पहले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जय सिंह ने दावा किया था कि यह अधिसूचना 2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के विपरीत जारी किया गया है, निसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए हौरिजेंटल आरक्षण की कोई योजना या नीति का उल्लेख नही किया गया है. याचिका में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग गया था, इस आधार पर उन्हें शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलना चाहिए.
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-भारत एक्सप्रेस
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