चार साल की मासूम बच्ची से रेप और हत्या के मामले में दोषी करार दिए गए वसंत संपत दुपारे की दोषसिद्धि को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है. जस्टिस विक्रम नाथ, संजय करोल और संदीप मेहता की बेंच ने सजा के मुद्दे पर सुनवाई के लिए सीजेआई बी आर गवई के पास भेज दिया है.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले में कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश इस केस पर लागू होगा. कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अनुच्छेद 32 के तहत समाप्त हो चुके मामलों को नियमित रूप से दोबारा नहीं खोला जा सकता.
दोषी की सजा को रखा बरकरार
कोर्ट ने कहा कि यह राहत उन मामलों के लिए आरक्षित रहेगी जहां प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का उल्लंघन हुआ हो दुपारे का दावा है कि उसे मौत की सजा सुनाने वाली निचली अदालत ने उसे अपना पक्ष रखने के लिए निष्पक्षता से अवसर नहीं दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2017 में दोषी की सजा को बरकरार रखते हुए कहा था कि एक नाबालिग बालिका के साथ बलात्कर रात के अंधेरे में उसकी गरिमा को वहशी तरीके से नष्ट करने के अलावा कुछ नहीं है.
दोषी को 2008 में सुनाई थी फांसी की सजा
कोर्ट ने घटना का जिक्र करते हुए कहा था कि दोषी अपने पड़ोस की इस बच्ची को बहलाने-फुसलाने के बाद उससे बलात्कार किया फिर दो पत्थरों से मार कर हत्या कर दी. बता दें कि यह घटना 2008 में नागपुर में घटी थी. इस मामले में दोषी वसंत संपत दुपारे को नागपुर जिला अदालत ने रेप और गत्या के मामले में 29 सितंबर 2008 को फांसी की सजा सुनाई थी. जिसे हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था. जिसके खिलाफ दोषी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था.
दोषी का अपराध जघन्यतम अपराध है
सुप्रीम कोर्ट में चल रही का सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि दोषी का अपराध जघन्यतम अपराध की श्रेणी में आता है और उसके सुधरने की कोई गुंजाइश नही है. वही दोषी के वकील का कहना था कि राज्य यह साबित करने के नाकाम रहा है कि दोषी सुधर नहीं सकता है कि दोषी नही सुधर सकता है. दोषी की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया जाए.
-भारत एक्सप्रेस
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