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ट्रांसजेंडर संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: मेडिकल बोर्ड तय करेगा जेंडर? कानून को लेकर अदालत पहुंचे एक्टिविस्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर 6 सप्ताह में जवाब मांगा है. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और अन्य द्वारा दायर इस याचिका में ‘सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन’ का अधिकार खत्म करने और पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता पर सवाल उठाए गए हैं.

SC notice to Centre on Transgender Amendment Act 2026 challenge

(AI IMAGE)

Transgender Amendment Act 2026: गोपाल कृष्ण/नई दिल्ली: ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और उनकी पहचान को लेकर एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत में बहस छिड़ गई है. मामला हाल ही में लागू हुए ‘ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026’ का है, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. कोर्ट ने इस गंभीर विषय पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर 6 हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा है. खास बात यह है कि इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अब तीन जजों की बेंच इस पर विस्तार से सुनवाई करेगी.

क्यों हो रहा है विरोध? पहचान पर छिड़ी जंग

दरअसल, यह पूरी कानूनी लड़ाई ट्रांसजेंडर पर्सन परिषद की अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और जैनब जाविद पटेल की ओर से दायर याचिका के बाद शुरू हुई है. याचिकाकर्ताओं का सबसे बड़ा ऐतराज इस बात पर है कि नए कानून ने ट्रांसजेंडर होने की परिभाषा ही बदल दी है. साल 2019 के कानून में ‘सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन’ यानी खुद की पहचान खुद तय करने का अधिकार था, जिसे नए संशोधन में हटा दिया गया है.

अब नए नियमों के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से खुद को ट्रांसजेंडर घोषित नहीं कर पाएगा. इसके लिए अब मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को अनिवार्य बना दिया गया है. जानकारों का मानना है कि इस एक बदलाव से देशभर के लाखों लोग, जो खुद को ट्रांसजेंडर मानते हैं, इस कैटेगरी से बाहर हो सकते हैं.

सजा के कड़े प्रावधान: आजीवन कारावास तक की नौबत

संशोधित कानून में अपराधों को लेकर सजा बेहद सख्त कर दी गई है. नए बिल के अनुसार:

  • अगर किसी बच्चे को जबरन ट्रांसजेंडर बनाया जाता है, तो दोषी को आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.
  • बालिग व्यक्ति के मामले में जबरन पहचान परिवर्तन या शारीरिक नुकसान पहुँचाने पर 10 साल की जेल और 2 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है.
  • विपक्षी दलों और LGBTQ समूहों का कहना है कि सजा सख्त करना अच्छी बात है, लेकिन पहचान तय करने का अधिकार छीनना उनकी गरिमा के खिलाफ है.

सीमित हो गई पहचान?

नए कानून ने ट्रांसजेंडर की परिभाषा को सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों जैसे किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता तक सीमित कर दिया है. हालांकि इसमें इंटरसेक्स लोगों को शामिल किया गया है, लेकिन ‘सेल्फ-आइडेंटिटी’ के अधिकार को खत्म करने से समुदाय के भीतर काफी नाराजगी है. 31 मार्च को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद से ही इस कानून को लेकर विरोध के स्वर तेज थे, जो अब अदालत की दहलीज तक जा पहुंचे हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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