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ट्रांसजेंडर संशोधन कानून: अलग-अलग हाई कोर्ट से मामले SC ट्रांसफर करने की उठी मांग, CJI ने दिया जल्द सुनवाई का भरोसा

सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसजेंडर संशोधन कानून को लेकर देश भर के हाई कोर्ट्स में लंबित याचिकाओं को ट्रांसफर करने की मांग पर जल्द सुनवाई हो सकती है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने CJI से इसकी अपील की है.

Supreme Court

ट्रांसजेंडर को लेकर देश की अलग-अलग अदालतों में लंबित याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर करने की मांग वाली याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की गई है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत से कहा कि दायर ट्रांसफर याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई की जाए. उन्होंने कहा कि अलग-अलग हाई कोर्ट्स में इस संशोधित कानून को चुनौती देने वाली याचिकाएं लंबित हैं, जिससे अलग-अलग फैसलों की संभावना बन सकती है. हालांकि सीजेआई सूर्यकांत ने संकेत दिया कि हाई कोर्ट को इस मुद्दे की जांच करने की अनुमति देने के अपने फायदे हो सकते हैं.

उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि कभी-कभी हमें हाई कोर्ट के दृष्टिकोण का भी लाभ मिल सकता है. इसके जवाब में मेहता ने कहा कि कई हाई कोर्ट इस मुद्दे पर सुनवाई कर रहे हैं, जिससे परस्पर विरोधी फैसलों की संभावना बढ़ जाती है. कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल मेहता को जल्द सुनवाई का भरोसा दिया है. दायर याचिका में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मान्यता, अधिकारों और संरक्षण को नियंत्रित करने वाले विभिन्न प्रावधानों में किए गए संशोधनों को चुनौती दी गई है. यह याचिका ट्रांसजेंडर पर्सन परिषद के अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और जैनब जाविद पटेल की ओर से दाखिल की गई है.

संशोधित कानून में ट्रांसजेंडर की नई परिभाषा

ट्रांसजेंडर संशोधन कानून को बीते 31 मार्च को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई थी. यह कानून इस बात को पुनर्परिभाषित करता है कि किसे ट्रांसजेंडर व्यक्ति माना जाएगा, साथ ही यह जबरन पहचान परिवर्तन और शारीरिक नुकसान जैसे गंभीर अपराधों से निपटने के लिए दंडात्मक प्रावधानों को भी मजबूत करता है. हालांकि संशोधित कानून को लेकर विपक्षी दल व एलजीबीटीक्यू समूह सवाल उठा रहे हैं. इस संशोधन में साल 2019 के कानून के आर्टिकल 4(2) हटाने का प्रस्ताव है. इसमें जेंडर के सेल्फ आइडेंटिफिकेशन के अधिकार का जिक्र था.

नई परिभाषा के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति जिनका संबंध किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता जैसे सामाजिक सांस्कृतिक पहचान वाले समुदाय से है, उन्हें ट्रांसजेंडर माना जाएगा. इसके अलावा इंटरसेक्स लोगों को भी इस परिभाषा के अन्तर्गत रखा गया है. इसमें सबसे बड़ा बदलाव यह है कि यह 2019 की तुलना में ट्रांसजेंडर पहचान को सीमित कर देती है. इसमें अब सेल्फ आइडेंटिफिकेशन वाले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जगह नहीं मिली है.

सजा के कड़े प्रावधान और ‘सेल्फ आइडेंटिफिकेशन’ खत्म

इसके अलावा नए बिल में सजा का भी प्रावधान है, नए बिल में बच्चों को ट्रांसजेंडर बनाने पर आजीवन कारावास की सजा व 5 लाख रुपए जुर्माना का प्रावधान है. वहीं बालिग के मामले में 10 साल तक की सजा व दो लाख तक का जुर्माना हो सकता है. नए संशोधित बिल के मुताबिक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अब अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार नहीं होगा, ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आवश्यक होगी. ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए सख्त सजा हो सकती है. ऐसे में खुद को ट्रांसजेंडर मानने वाले लाखों लोग इस कैटेगरी से बाहर हो जाएंगे.

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2019 के एक्ट में यह प्रावधान था कि कोई भी शख्स अपनी इच्छा से खुद को ट्रांसजेंडर घोषित कर सकता था और उसके बाद उसे डीएम से सर्टिफिकेट मिल जाता है. लेकिन अब यह व्यवस्था समाप्त हो गई है और मेडिकल टेस्ट कराना जरूरी कर दिया गया है. मेडिकल टेस्ट के बाद ही डीएम किसी को ट्रांसजेंडर का सर्टिफिकेट दे पाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने नालसा बनाम भारत संघ 2014 के केस में यह फैसला सुनाया था कि खुद की पहचान मौलिक अधिकार है. कोई भी व्यक्ति यह तय कर सकता है कि वह पुरुष है, महिला है या फिर ट्रांसजेंडर है. इसके लिए किसी मेडिकल जांच की जरूरत नहीं है. साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कानून सेवा प्राधिकरण से जुड़े फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता दी थी.



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