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जब रिश्तों में ड्रामा नहीं, असलियत थी; जानिए 25 साल बाद भी क्यों ताजा महसूस होती है फरहान अख्तर की यह फिल्म?

‘दिल चाहता है’ सिर्फ तीन दोस्तों की कहानी नहीं थी. यह पहली बार था जब हमारी उम्र के लड़के स्क्रीन पर अपनी तरह की दुनिया में दिखाई दे रहे थे.

कुछ फिल्में रिलीज होती हैं, कुछ फिल्में याद रह जाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो वक्त बीतने के साथ और ज्यादा अपनी लगने लगती हैं. फरहान अख्तर की पहली फिल्म ‘दिल चाहता है’ इसी तीसरी कैटेगरी में आती है. 10 अगस्त 2001 को रिलीज हुई यह फिल्म आज 25 साल बाद भी सिर्फ एक पुरानी बॉलीवुड फिल्म नहीं लगती. इसे देखते हुए ऐसा महसूस होता है जैसे अपने ही किसी पुराने दोस्त से मुलाकात हो रही हो.

फिल्म की सबसे बड़ी खासियत शायद यही थी कि इसमें जिंदगी को बहुत बड़ा बनाकर पेश नहीं किया गया था. आकाश, समीर और सिद्धार्थ तीनों की जिंदगी में कोई दुनिया बचाने वाला मिशन नहीं था. वे दोस्त थे, घूमते थे, प्यार में पड़ते थे, एक-दूसरे की खिंचाई करते थे और कभी-कभी छोटी-छोटी बातों पर बुरी तरह भिड़ भी जाते थे.

आमिर खान का आकाश तेज-तर्रार, मजाकिया और भावनाओं से बचने वाला लड़का है. उसे हर गंभीर बात में भी मजाक नजर आता है. दूसरी तरफ सैफ अली खान का समीर दिल का अच्छा लेकिन प्यार के मामले में थोड़ा उलझा हुआ इंसान है. अक्षय खन्ना का सिद्धार्थ, यानी सिड, दोनों से काफी अलग है. वह शांत है, संवेदनशील है और चीजों को थोड़ी गहराई से देखने वाला कलाकार है.

इन तीनों के बीच की दोस्ती इसलिए असली लगती है क्योंकि तीनों एक जैसे नहीं हैं. उनकी पसंद अलग है, सोच अलग है और जिंदगी को देखने का नजरिया भी अलग है. फिर भी उनके बीच एक ऐसा रिश्ता है, जिसमें साथ हंसने के साथ-साथ असहमति की भी जगह है.

यही बात ‘दिल चाहता है’ को उस दौर की बाकी फिल्मों से अलग करती थी. यहां दोस्ती का मतलब हर वक्त साथ रहना नहीं था. दोस्त नाराज हो सकते हैं, एक-दूसरे से दूर जा सकते हैं और कुछ फैसलों को लेकर पूरी तरह असहमत भी हो सकते हैं.

बॉलीवुड में युवाओं की कहानी बदल गई

2001 के आसपास हिंदी फिल्मों में युवाओं की जिंदगी अक्सर बहुत ज्यादा नाटकीय अंदाज में दिखाई जाती थी. ‘दिल चाहता है’ ने इस तस्वीर को बदलने की कोशिश की. फिल्म में बातचीत ऐसी थी, जैसे आम लोग आपस में बात करते हैं. किरदारों की परेशानियां भी ऐसी थीं जिन्हें शहरों में रहने वाला युवा आसानी से समझ सकता था.

कॉलेज के बाद की वह उम्र, जब पढ़ाई खत्म हो चुकी है लेकिन जिंदगी की असली जिम्मेदारियां अभी पूरी तरह सामने नहीं आई हैं फिल्म ने इसी दौर को पकड़ लिया था. दोस्ती, करियर, प्यार और परिवार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश इसमें बिना किसी भारी-भरकम भाषण के दिखाई गई.

गोवा की ट्रिप तो फिल्म की पहचान ही बन गई. चापोरा फोर्ट पर दोस्तों के साथ बिताया गया वक्त बाद में हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार पलों में गिना जाने लगा. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह लोकेशन और ये तीन किरदार आने वाले वर्षों में इतनी बड़ी पॉप कल्चर याद बन जाएंगे.

फिल्म की महिलाओं को भी सिर्फ कहानी आगे बढ़ाने वाले किरदारों की तरह नहीं रखा गया. प्रीति जिंटा की शालिनी आकाश के सामने प्यार को लेकर उसका हल्का-फुल्का नजरिया बदलती है. सोनाली कुलकर्णी की पूजा समीर की उलझी हुई प्रेम कहानी में एक स्थिरता लेकर आती है.

वहीं डिंपल कपाड़िया की तारा का किरदार फिल्म को एक अलग भावनात्मक गहराई देता है. तारा अपने जीवन, अकेलेपन और संघर्षों के साथ एक स्वतंत्र इंसान के रूप में सामने आती है. सिड और तारा का रिश्ता उस समय की मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों के लिहाज से काफी अलग था और इसी वजह से आज भी उस पर चर्चा होती है.

गाने और स्टाइल भी बन गए पहचान

‘दिल चाहता है’ की कहानी के साथ उसका संगीत भी लोगों के दिल में उतर गया. शंकर-एहसान-लॉय का संगीत और जावेद अख्तर के बोल फिल्म के मूड के साथ इतनी अच्छी तरह घुलते हैं कि कई गाने आज भी 2001 की याद दिला देते हैं.

‘दिल चाहता है’ और ‘जाने क्यों’ जैसे गानों में उस दौर की युवा ऊर्जा, दोस्ती और आजादी का एहसास साफ महसूस होता है. फिल्म की लोकेशन और विजुअल स्टाइल ने भी अपनी अलग छाप छोड़ी. मुंबई की शहरी जिंदगी से लेकर गोवा और ऑस्ट्रेलिया तक, फिल्म की दुनिया उस समय के युवाओं के सपनों और उनकी वास्तविक जिंदगी के बीच एक दिलचस्प पुल बनाती थी.

फिल्म को शहरी दर्शकों के बीच खास सफलता मिली और बाद में इसे कल्ट क्लासिक का दर्जा मिला. इसे सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. लेकिन ‘दिल चाहता है’ की असली उपलब्धि शायद पुरस्कारों से कहीं बड़ी थी.

इसने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को यह भरोसा दिया कि दोस्ती, बातचीत और रोजमर्रा की जिंदगी पर आधारित कहानी भी बड़े पर्दे पर दर्शकों को जोड़ सकती है. इसके बाद युवाओं, दोस्ती और बदलते रिश्तों पर बनी कई फिल्मों में इसका असर किसी न किसी रूप में दिखाई दिया.

फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी की एक्सेल एंटरटेनमेंट ने फिल्म के 25 साल पूरे होने के मौके पर नई पीढ़ी के फिल्मकारों को समर्थन देने की पहल की घोषणा भी की है. यह बात अपने आप में दिलचस्प है—जिस फिल्म ने कभी नई आवाज के साथ हिंदी सिनेमा में कदम रखा था, वही अब अगली पीढ़ी की आवाजों के लिए जगह बनाने की कोशिश कर रही है.

25 साल बाद भी दिल के करीब

समय बदल गया. तकनीक बदल गई. फिल्मों का तरीका बदल गया. लेकिन आकाश, समीर और सिड की दोस्ती आज भी उतनी ही जिंदा महसूस होती है.

शायद इसलिए कि ‘दिल चाहता है’ ने जिंदगी को परफेक्ट दिखाने की कोशिश नहीं की. इसमें दोस्ती में दरार है, प्यार में उलझन है, गलत फैसले हैं और ऐसे पल भी हैं जब इंसान अपने सबसे करीबी लोगों से दूर हो जाता है और यही तो असली जिंदगी है.

25 साल बाद इस फिल्म को देखने पर सबसे ज्यादा यही महसूस होता है कि इसकी कहानी किसी एक पीढ़ी की नहीं है. हर दौर में ऐसे दोस्त होते हैं, जो साथ बड़े होते हैं, फिर अपने-अपने रास्ते चुन लेते हैं और सालों बाद मिलने पर बातचीत वहीं से शुरू हो जाती है जहां छोड़ी थी.

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-भारत एक्सप्रेस 



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