Bharat Express DD Free Dish

जिस कहानी पर चला था मुकदमा… जानिए कौन थीं बेबाक लेखिका इस्मत चुगताई?

इस्मत चुगताई ने अपने बेबाक लेखन से उर्दू साहित्य में महिलाओं की आवाज को नई पहचान दी। उन्होंने समाज के उन सच को सामने रखा, जिन पर बात करने से लोग अक्सर बचते थे.

उर्दू साहित्य की दुनिया में इस्मत चुगताई का नाम सिर्फ एक लेखिका के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसी आवाज के रूप में लिया जाता है जिसने अपने समय की सामाजिक बंदिशों को खुलकर चुनौती दी. उन्होंने उन मुद्दों पर लिखा, जिन पर बात करना भी उस दौर में आसान नहीं था. महिलाओं की जिंदगी, उनकी इच्छाएं, उनकी परेशानियां और समाज के दोहरे मापदंड—इस्मत ने इन सबको अपनी कहानियों का हिस्सा बनाया. यही वजह है कि शुरुआत में उनकी रचनाओं पर सवाल उठे, उन्हें अश्लील तक कहा गया, लेकिन समय के साथ उनकी अहमियत और बढ़ती गई.

महिलाओं की जिंदगी को दिया नया नजरिया

इस्मत चुगताई का जन्म 21 अगस्त 1911 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था. उस समय समाज में महिलाओं की भूमिका को लेकर सोच काफी सीमित थी. साहित्य में भी उनकी दुनिया को अक्सर आदर्श और मर्यादा की चौखट के भीतर ही दिखाया जाता था. इस्मत ने इस तस्वीर को बदलने की कोशिश की.

उनकी कहानियों में महिलाएं सिर्फ किसी पुरुष पात्र की पत्नी, बेटी या बहन बनकर नहीं आतीं. वे अपनी सोच रखती हैं, अपनी पसंद-नापसंद होती है और उनके भीतर भी इच्छाएं और बेचैनियां होती हैं. इस्मत ने इसी मानवीय पक्ष को बिना लाग-लपेट के सामने रखा. उनके लेखन में घर की चारदीवारी के भीतर छिपे वे सवाल दिखाई देते हैं, जिन पर परिवार और समाज अक्सर चुप रहना पसंद करते हैं.

उनका अंदाज भी बेहद सीधा था. वह बात को घुमाने के बजाय सीधे मुद्दे पर आती थीं. इसी बेबाकी ने उन्हें अपने दौर के दूसरे लेखकों से अलग पहचान दी. उनकी तुलना अक्सर सआदत हसन मंटो से भी की जाती है, क्योंकि दोनों ने समाज के उन पहलुओं को साहित्य में जगह दी जिन्हें लोग नजरअंदाज करना चाहते थे.

‘लिहाफ़’ ने मचा दिया था हंगामा

1942 में उनकी चर्चित कहानी ‘लिहाफ़’ सामने आई तो साहित्यिक दुनिया में तहलका मच गया. कहानी में एक महिला की दबाई गई इच्छाओं और उसके रिश्ते की जटिलता को जिस तरह पेश किया गया, वह उस समय के समाज के लिए बेहद असहज विषय था. कहानी को अश्लील बताया गया और मामला अदालत तक पहुंच गया.

लाहौर में इस कहानी को लेकर इस्मत चुगताई पर मुकदमा चला. उन्हें आलोचनाओं के साथ-साथ धमकियों का भी सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने अपने लेखन के लिए माफी मांगने का रास्ता नहीं चुना. वह अदालत में डटी रहीं और आखिरकार मुकदमा जीत गईं.

उनकी बेबाक शख्सियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मंटो ने उनके बारे में कहा था कि अगर वह औरत होते तो इस्मत होते और अगर इस्मत मर्द होतीं तो मंटो होतीं. दोनों की दोस्ती और साहित्यिक समानता आज भी उर्दू साहित्य की चर्चित कहानियों में शामिल है.

साहित्य से सिनेमा तक पहुंची उनकी आवाज

इस्मत चुगताई की रचनात्मक दुनिया सिर्फ कहानियों और उपन्यासों तक सीमित नहीं रही. उन्होंने फिल्मों के लिए भी काम किया और हिंदी सिनेमा से उनका गहरा जुड़ाव रहा. वह करीब 13 फिल्मों से जुड़ी रहीं.

उनकी आखिरी फिल्मों में शामिल ‘गर्म हवा’ खास तौर पर याद की जाती है. 1973 में आई इस फिल्म ने भारत के विभाजन के बाद आम लोगों की जिंदगी पर पड़े असर और इंसानी रिश्तों की पीड़ा को बेहद संवेदनशील तरीके से सामने रखा. फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार जैसे सम्मान भी मिले.

आखिरी वक्त तक कायम रहा बेबाक अंदाज

24 अक्टूबर 1991 को 80 साल की उम्र में इस्मत चुगताई का निधन हो गया. उनकी इच्छा के अनुसार उनके पार्थिव शरीर को दफनाने के बजाय अग्नि दी गई. लेकिन इस्मत चुगताई की विरासत उनके जाने के साथ खत्म नहीं हुई.

आज भी उनकी कहानियां पढ़ने पर लगता है कि उन्होंने सिर्फ अपने समय की बात नहीं की थी. उन्होंने ऐसे सवाल उठाए थे जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जरूरी थे. समाज में महिलाओं की आजादी, उनकी पहचान और उनकी अपनी आवाज को लेकर आज जितनी चर्चा होती है, उसमें इस्मत जैसे लेखकों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

इस्मत चुगताई का लेखन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने पाठक को सिर्फ कहानी नहीं सुनाई, बल्कि उसे अपने आसपास की दुनिया पर दोबारा नजर डालने के लिए मजबूर किया. उन्होंने दिखाया कि साहित्य केवल मनोरंजन का जरिया नहीं है. वह समाज के सामने आईना भी रख सकता है और कभी-कभी ऐसा आईना, जिसमें अपना चेहरा देखना आसान नहीं होता है.

यह भी पढ़ें: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सिलीगुड़ी में परखी SSB की सुरक्षा तैयारी, ड्रोन और AI से लैस हाई-टेक निगरानी का लिया जायजा

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read