महाभारत काल के प्रसिद्ध शंख
सनातन धर्म में शंख को केवल पूजा-पाठ या पावनता का प्रतीक ही नहीं, बल्कि शौर्य, वीरता और विजय का सूचक माना गया है. मान्यता है कि जहाँ तक शंख की ध्वनि पहुँचती है, वहाँ से नकारात्मक शक्तियाँ और मानसिक विकार स्वतः नष्ट हो जाते हैं. प्राचीन काल में युद्ध के आरंभ और समाप्ति की घोषणा शंखनाद से ही होती थी.
महाभारत का कुरुक्षेत्र युद्ध भारतीय पौराणिक इतिहास का सबसे विनाशकारी युद्ध माना गया है. 18 दिन चले उस महायुद्ध के पहले दिन जब दोनों पक्षों के महारथियों ने अपने-अपने शंख बजाए, तो धरती-आकाश भी काँप उठे थे. श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय के श्लोक 12 से 18 में इन शंखों और उन्हें बजाने वाले योद्धाओं का वर्णन मिलता है. आइए जानते हैं महाभारत के प्रमुख शूरवीरों के शंखों के नाम, उनकी शक्ति और उत्पत्ति का पौराणिक इतिहास –
1. श्रीकृष्ण का शंख – पांचजन्य (Panchajanya)
महाभारत युद्ध के सूत्रधार भगवान श्रीकृष्ण के शंख का नाम ‘पांचजन्य’ था, जिसकी ध्वनि कई कोस दूर तक गूँजती थी. उस शंख की उत्पत्ति के बारे में विष्णु पुराण में एक कथा है, कि जब श्रीकृष्ण और बलराम ने महर्षि सांदीपनि के आश्रम में अपनी शिक्षा पूरी की, तो उन्होंने गुरु दक्षिणा के रूप में अपने मृत पुत्र को वापस माँगा. गुरुपुत्र की खोज में श्रीकृष्ण समुद्र की गहराइयों में गए, जहाँ ‘शंखासुर’ (या पंचजन) नामक एक भयानक असुर रहता था. श्रीकृष्ण ने उस असुर का वध किया. उस असुर के शरीर का कठोर आवरण एक दिव्य शंख के रूप में था, जिसे श्रीकृष्ण ने अपने पास रख लिया और असुर के नाम पर ही इसका नाम ‘पांचजन्य’ पड़ा.

2. अर्जुन का शंख – देवदत्त (Devadatta)
पाण्डव पक्ष के मुख्य महारथी और गांडीवधारी अर्जुन के शंख का नाम ‘देवदत्त’ था. पांचजन्य के बाद कुरुक्षेत्र में सबसे तीव्र और वज्र जैसी ध्वनि इसी शंख की थी.
उत्पत्ति कैसे हुई: महाभारत के वन पर्व के अनुसार, जब अर्जुन ने खांडव वन के दहन में अग्निदेव की सहायता की थी, तब प्रसन्न होकर जल के देवता वरुण देव ने अर्जुन को गांडीव धनुष, अक्षय तरकश और यह ‘देवदत्त’ नामक अलौकिक शंख प्रदान किया था. जब अर्जुन इसे बजाते थे, तो शत्रुओं के हौसले पस्त हो जाते थे.
3. भीमसेन का शंख – पौंड्र (Paundra)
अगाध शारीरिक बल वाले पाण्डव गदाधारी भीमसेन के शंख का नाम ‘पौंड्र’ (या पौंड्रिक) था.
विशेषता: चूंकि भीमसेन का शरीर विशाल और भोजन अत्यधिक होता था, उनका शंख भी आकार में बड़ा और भारी था. श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है कि भयानक कर्म करने वाले भीमसेन ने ‘पौंड्र’ नामक महाशंख बजाया, जिसकी प्रतिध्वनि किसी शेर की दहाड़ या बादलों के फटने जैसी लगती थी.
अन्य प्रमुख पाण्डवों और योद्धाओं के शंख:
श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय के श्लोक 16-18 के अनुसार बाकी पाण्डव भाइयों और महारथियों ने इन शंखों का नाद किया था:
योद्धा का नाम / शंख का नाम / उत्पत्ति
- युधिष्ठिर अनंतविजय (Anantavijaya) कुरुवंश का राजसी शंख
- नकुल सुघोष (Sughosha) अश्विनी कुमारों से प्राप्त
- सहदेव मणिपुष्पक (Manipushpaka) अश्विनी कुमारों का दुर्लभ मणि युक्त शंख
- धृष्टद्युम्न यज्ञघोष (Yajnaghosha) द्रुपद पुत्र को अग्निदेव द्वारा दिया गया
5. कौरव पक्ष के प्रमुख महारथियों के शंख:
केवल पाण्डवों के पास ही नहीं, कौरव खेमे के महारथियों के पास भी विशिष्ट शंख थे:
भीष्म पितामह का शंख – गंगनाभ (Ganganabha)
कौरव सेना के प्रथम प्रधान सेनापति और कुरुवंश के संरक्षक भीष्म पितामह के शंख का नाम ‘गंगनाभ’ था. कुरुक्षेत्र युद्ध की आधिकारिक शुरुआत भीष्म पितामह द्वारा इसी शंख को बजाकर की गई थी. ‘गंगनाभ’ का शाब्दिक अर्थ होता है— ‘गंगा की भीषण ध्वनि’.
यह अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी शंख पितामह भीष्म को उनकी माता, साक्षात देवनदी गंगा से उपहार स्वरूप प्राप्त हुआ था. जब भीष्म पितामह ने सिंह गर्जना करते हुए इस शंख को बजाया, तो कौरव सेना में उत्साह भर गया और पाण्डव सेना में कोहराम मच गया था.
दुर्योधन का शंख – विदारक (Vidaraka): दुर्योधन के शंख का नाम ‘विदारक’ था. इसके नाम का अर्थ ही होता है— ‘हृदय को विदीर्ण करने वाला या अत्यंत कष्ट देने वाला’. इसकी ध्वनि बहुत तीखी और कानों को चुभने वाली थी.
अंगराज कर्ण का शंख – हिरण्यगर्भ (Hiranyagarbha): सूर्यपुत्र कर्ण के पास जो शंख था, उसका नाम ‘हिरण्यगर्भ’ था. यह शंख उन्हें उनके पिता सूर्यदेव के आशीर्वाद और मंत्र प्रसाद से प्राप्त हुआ था, जिसका अर्थ ‘सृष्टि का आरंभ’ होता है.

महाभारत का शंखनाद केवल कुरुक्षेत्र के मैदान तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरा ध्वनि विज्ञान (Sound Science) छिपा हुआ था. आधुनिक शोध बताते हैं कि युद्ध के मैदान में अत्यधिक तनाव और भय के माहौल में शंख की उच्च आवृत्ति (High Frequency) वाली आवाज योद्धाओं के मस्तिष्क में ‘एड्रिनालिन’ हार्मोन का स्राव बढ़ाती थी, जिससे उनका डर समाप्त हो जाता था और वे वीरता से लड़ पाते थे. यही कारण है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध की शुरुआत राजा विराट के एक पुत्र (जिसका नाम भी ‘शंख’ था) से लेकर महारथियों के शंखनाद तक, इस पवित्र वाद्य यंत्र के इर्द-गिर्द बुनी गई थी.
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