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श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के लिए फिर बुलंद हुई आवाज, साधु-संतों ने कर डाली ‘कारसेवा’ की घोषणा; कब निपटेगा विवाद?

कृष्णनगरी मथुरा में 16वीं सदी में इस्‍लामी आक्रांताओं ने मूल मंदिर ध्‍वस्‍त करके उसके ऊपर ही शाही ईदगाह बनवा दिया था. अतिक्रमण हटाने के लिए हिंदु अनुयायियों ने अनेक प्रयास किए. अब एक बार फिर उठने लगी ‘कारसेवा’ की आवाज —

Krishna Janmabhoomi Mathura

श्रीकृष्ण की अवतरण-स्थली पर मुगलों ने बनवाई थी मस्जिद, जिसे शाही ईदगाह कहते हैं.

KRISHNA JANMABHOOMI : धर्मनगरी मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति और वहां भव्य मंदिर निर्माण को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. अयोध्या में प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर निर्माण के बाद अब साधु-संतों ने कान्हा की नगरी मथुरा का रुख किया है. आज मथुरा के राधाकुंड क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध चित्रगुप्त पीठ में साधु-संतों की उपस्थिति में एक विशेष सभा हुई, जिसमें शंखनाद, भागवत कथा और हवन-पूजन के साथ आगामी 6 दिसंबर को श्रीकृष्ण जन्मभूमि के लिए ‘कारसेवा’ करने की आधिकारिक घोषणा की गई.

चित्रगुप्त पीठ के पीठाधीश्वर स्वामी सच्चिदानंद महाराज ने इसके साथ ही श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर में ठाकुरजी (भगवान कृष्ण) को विशेष भोग लगाने की योजना की भी घोषणा की. इस बड़े ऐलान के बाद जहां एक ओर शिव और कृष्ण भक्तों में भारी उत्साह है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन और पुलिस व्यवस्था अलर्ट मोड पर आ गई है.

अयोध्या की तर्ज पर मथुरा में शुरू हुआ ‘महासंकल्प’

चित्रगुप्त पीठ में रविवार सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू हो गया था. भगवान कृष्ण की महिमा का गुणगान करने के लिए भागवत कथा और कीर्तन का आयोजन हुआ. इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूर्ण आहुति देकर कारसेवा की तारीख का शंखनाद किया गया.

चित्रगुप्त पीठाधीश्वर सच्चिदानंद महाराज ने कहा-

“यह यज्ञ और अनुष्ठान एक बेहद खास और पवित्र संकल्प के साथ किया जा रहा है. यह आंदोलन और यज्ञ तब तक अनवरत जारी रहेगा, जब तक भगवान श्री कृष्ण को उनकी वास्तविक जन्मभूमि पर पूर्ण वैभव के साथ स्थापित नहीं कर दिया जाता. ठीक वैसे ही जैसे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के महासंकल्प के लिए वर्षों पहले ‘यज्ञ’ और कारसेवा की शुरुआत की गई थी.”


उन्होंने आगे बताया कि कारसेवा के इस महाअभियान से पहले सभी आवश्यक धार्मिक रस्में पूरी कर ली गई हैं. शास्त्रों के अनुसार, जब भी कोई अत्यंत शुभ या क्रांतिकारी कार्य किया जाता है, तो उससे पहले देवताओं का आह्वान, हवन-पूजन और कीर्तन अनिवार्य होता है. हमने भागवत कथा और कीर्तन पहले ही संपन्न कर लिया था, और रविवार को हवन-पूजन भी निर्विघ्न पूरा हो गया है.

मथुरा में ‘कारसेवा’ के लिए गुलाबी पत्थरों की पहली खेप पहुंची

6 दिसंबर को होने वाली कारसेवा और प्रस्तावित मंदिर निर्माण की घोषणा के साथ ही, चित्रगुप्त पीठ के आश्रम में निर्माण कार्य के लिए विशेष रूप से मंगाए गए तराशे गए गुलाबी पत्थरों की पहली खेप भी पहुंच गई है. इन पत्थरों के आने से ही यह साफ हो गया है कि संत समाज इस बार पीछे हटने के मूड में नहीं है. हालांकि, इसी बीच आश्रम परिसर से एक बेसकीमती नक्काशीदार पत्थर के अचानक गायब होने की खबर से हल्ला मच गया है.

इस पर चिंता व्यक्त करते हुए स्वामी सच्चिदानंद महाराज ने कहा, “मुझे अभी-अभी बेसकीमती पत्थर के गायब होने की जानकारी मिली है. ऐसा प्रतीत होता है कि वह पत्थर उस निश्चित स्थान पर नहीं है जहां हमने उसे रखवाया था. हम आंतरिक स्तर पर यह पता लगाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि उसे किसने और किस इरादे से वहां से हटाया है. फिलहाल इस मामले में हमारे पास कोई पुख्ता जानकारी नहीं है.”

मथुरा में सुरक्षा बल तैनात, CRPF और कमांडो का फ्लैग मार्च

कारसेवा के इस बड़े ऐलान और आश्रम में निर्माण सामग्री (गुलाबी पत्थरों) के पहुंचने के बाद उत्तर प्रदेश शासन और जिला प्रशासन कानून-व्यवस्था को लेकर पूरी तरह मुस्तैद हो गया है. एहतियात के तौर पर चित्रगुप्त पीठ के चारों तरफ और मथुरा के संवेदनशील इलाकों में भारी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी गई है.

आईजी (IG), एसपी (SP), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), विशेष कमांडो और स्थानीय पुलिस के जवानों ने संयुक्त रूप से पूरे शहर और जन्मभूमि के आसपास के क्षेत्रों में फ्लैग मार्च निकाला. प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि किसी भी असामाजिक तत्व को शहर की शांति और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

16वीं-17वीं सदी का काला इतिहास: मुगलों ने ढहाए देवालय

16वीं और 17वीं सदी में जब हिंदुस्तान पर क्रूर इस्‍लामिक शासकों का दौर था, तब भारतीय उपमहाद्वीप के हजारों प्राचीन, भव्य और ऐतिहासिक मंदिरों व पवित्र तीर्थ स्थलों को ध्वस्त किया गया था. विशेषकर मुगल आक्रांता औरंगजेब के शासनकाल में हिंदू धार्मिक आस्था के सबसे बड़े केंद्रों पर प्रहार किया गया. औरंगजेब ने न केवल काशी में बाबा विश्वनाथ के पवित्र मंदिर को खंडित किया, बल्कि मथुरा-वृंदावन समेत देश के कोने-कोने में स्थित ऐतिहासिक देवालयों का बेरहमी से विध्वंस कराया और उनकी जगह अपने मजहबी ढांचे खड़े करवा दिए.

श्रीकृष्ण मंदिर का पौराणिक इतिहास और कंस का कारागार

पौराणिक और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, मथुरा का यह स्थान कोई सामान्य भूमि नहीं है, बल्कि यह स्वयं साक्षात भगवान विष्णु के मानव अवतार श्रीकृष्ण की अवतरण-स्थली (Birth Place) है. आज से 5 हजार साल से भी पहले, द्वापर युग में कंस के उस अत्याचारी कारागार (जेल) की कोठरी में कान्हा का प्राकट्य हुआ था.

शास्त्रों के अनुसार, कलयुग की शुरुआत के समय भगवान कृष्ण के प्रपौत्र (परपोते) महाराज वज्रनाभ ने अपने पूर्वज की स्मृतियों को संजोने और लोक कल्याण के लिए ठीक उसी स्थान पर एक भव्य और विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था, जहां कंस का कारागार स्थित था. इतिहास में इस मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार हुआ. गुप्त काल और राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय यहां बना मंदिर इतना भव्य था कि उसकी वास्तुकला को देखने दुनिया भर से लोग आते थे.

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मुगलों द्वारा मंदिर तोड़कर बनाई गई शाही ईदगाह मस्जिद

ऐतिहासिक साक्ष्यों और गहन शोध से पता चलता है कि मौजूदा विवादित ढांचा (शाही ईदगाह मस्जिद) पूरी तरह से प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेषों और उसकी जमीन को हड़पकर बनाया गया है:

ओरछा नरेश का भव्य मंदिर: मुगल काल में औरंगजेब से पहले, जहांगीर के शासनकाल के दौरान ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने लगभग 33 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक गगनचुंबी और भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था. यह मंदिर इतना विशाल था कि इसकी भव्यता आगरा और दिल्ली तक दिखाई देती थी.

औरंगजेब का क्रूर फरमान (1670): समकालीन मुगल इतिहासकार साकी मुस्तैद खान की पुस्तक ‘मासिर-ए-आलमगीरी’ के अनुसार, साल 1670 में क्रूर मुगल बादशाह औरंगजेब ने एक शाही फरमान जारी कर राजा वीर सिंह देव द्वारा बनवाए गए इस भव्य केशवदेव (श्रीकृष्ण) मंदिर को पूरी तरह से जमींदोज करने का आदेश दिया.

मंदिर के मलबे से ईदगाह का निर्माण: मुगलों ने न केवल मंदिर को तोड़ा, बल्कि उसकी भव्य मूर्तियों को आगरा ले जाकर बेगम साहिबा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दफन कर दिया ताकि आने-जाने वाले उस पर पैर रख सकें. इसके बाद, मंदिर के चबूतरे और उसके मलबे (खंभों, दीवारों) का इस्तेमाल करके उसके एक बड़े हिस्से पर जबरन शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण करवा दिया गया. आज भी इस मस्जिद की दीवारों पर प्राचीन हिंदू स्थापत्य कला के प्रतीक, नक्काशी और मंदिर के खंभे साफ देखे जा सकते हैं.

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कानूनी विवाद: अदालतों में 18 मुकदमों की एक साथ सुनवाई

श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद का यह सदियों पुराना विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालतों में कानूनी लड़ाई के दौर से गुजर रहा है. हिंदू पक्ष का साफ तौर पर कहना है कि पूरी 13.37 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की है, जिसके एक हिस्से पर अवैध कब्जा करके मस्जिद बनाई गई है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष (शाही ईदगाह कमेटी और वक्फ बोर्ड) की उन सभी याचिकाओं और आपत्तियों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ का हवाला देकर मामले को बंद करने की मांग की थी. हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि हिंदू पक्ष की सभी 18 याचिकाओं पर एक साथ मेरिट के आधार पर सुनवाई की जाएगी.

SC की मुहर: सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में दखल देने से इनकार करते हुए मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज कर दी, जिससे अब निचली और उच्च अदालतों में वैज्ञानिक सर्वेक्षण (एएसआई सर्वे) और मालिकाना हक की कानूनी लड़ाई का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है.

इसी कानूनी गहमागहमी और CM योगी द्वारा विपक्ष को दिए गए कड़े राजनीतिक संदेशों (“अगर हिम्मत है तो श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति पर खुलकर बोलें“) के बीच, संतों का 6 दिसंबर को कारसेवा करने का ऐलान उत्तर प्रदेश की सियासत और सामाजिक विमर्श को एक नई और बेहद संवेदनशील दिशा में ले जाता दिख रहा है.

यह भी पढ़िए: श्रीकृष्ण की अवतरण-स्थली पर बने मुगलों के ईदगाह मामले पर उच्च न्यायालय में होगी सुनवाई, जानिए कब-कैसे तोड़ा गया था मंदिर



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