Mathura-Vrindavan Holi: होली का असली रंग अगर कहीं देखने को मिलता है, तो वह मथुरा और वृंदावन में. यहां लोग सिर्फ रंगों से नहीं, बल्कि भक्ति और श्रद्धा के रंग में रंगकर होली मनाते हैं. 25 फरवरी से ही मथुरा-वृंदावन में होली की शुरुआत हो चुकी है. 4 मार्च से पहले ही यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचने लगे हैं. देश के अलग-अलग राज्यों से लोग वृंदावन आकर इस खास होली का आनंद ले रहे हैं.
मथुरा और वृंदावन के मंदिरों में होली का अलग ही रूप देखने को मिलता है. यही वजह है कि लोग यहां की होली देखने और ब्रज की पवित्र रज को माथे से लगाने दूर-दूर से आते हैं.
राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ाव
इटावा से आए एक श्रद्धालु ने बताया कि उन्होंने मथुरा की होली के बारे में बहुत सुना था, लेकिन यहां आकर अनुभव उससे भी ज्यादा खास लगा. उन्होंने कहा कि यहां की होली में एक अलग मिठास है, जो राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ाव का एहसास कराती है. इसी आनंद को महसूस करने के लिए वे अपने परिवार के साथ यहां पहुंचे हैं.
सूतक या ग्रहण से कोई फर्क नहीं
दिल्ली से आए राघव ने बताया कि वे हर साल होली मनाने वृंदावन आते हैं. उन्होंने कहा कि लोग भले ही सूतक या ग्रहण की बात करें, लेकिन उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. यहां आकर भगवान के दर्शन करने के बाद मन को शांति मिलती है और लगता है कि दिन सफल हो गया.
एक अन्य श्रद्धालु ने बताया कि वे पिछले छह साल से लगातार वृंदावन में ही होली मना रहे हैं, क्योंकि यहां जैसी प्रेम और भक्ति से भरी होली देश में कहीं और नहीं होती. मथुरा और वृंदावन के अलावा, कोलकाता के इस्कॉन मंदिर में भी भक्तों ने राधा नाम का जप करते हुए प्रेम और उत्साह के साथ होली खेली.
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इस्कॉन मंदिर के उपाध्यक्ष ने क्या कहा
इस्कॉन मंदिर के उपाध्यक्ष राधारमन प्रभु ने बताया कि चैतन्य महाप्रभु प्रेम और भक्ति का संदेश देने के लिए धरती पर आए थे. उनका जन्म 1486 में नबद्वीप में हुआ था. संयोग से उनका जन्म होली के दिन हुआ था, उस समय भी लोग होली मना रहे थे. खास बात यह है कि उस दिन चंद्र ग्रहण भी था और इस बार भी वही संयोग बना हुआ है.
-भारत एक्सप्रेस
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