UP Politics: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच विधान परिषद (MLC) की 11 सीटों पर हो रहा चुनाव अचानक सबसे बड़ा सियासी अखाड़ा बन गया है. शिक्षक और स्नातक कोटे की इन सीटों पर कब्जा जमाने के लिए भाजपा और समाजवादी पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. एक तरफ जहां खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ताबड़तोड़ जनसभाएं कर प्रचार की कमान संभाले हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने आखिरी वक्त में अपने दो उम्मीदवार बदलकर मुकाबले को और भी दिलचस्प बना दिया है.
उत्तर प्रदेश में शिक्षक और स्नातक कोटे की 11 विधान परिषद (MLC) सीटों पर हो रहे चुनाव विधानसभा चुनाव से पहले बेहद अहम हो गए हैं. भाजपा की ओर से खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनाव प्रचार की कमान संभाल ली है, जबकि समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रणनीतिक दांव खेलते हुए अंतिम समय में दो प्रत्याशी बदल दिए हैं. इस चुनाव को खास बनाने वाली तीन मुख्य वजहें हैं: बैलेट पेपर से मतदान (जो ईवीएम नैरेटिव तय करेगा), केवल पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी वर्ग का वोटर होना, और इन 11 सीटों का प्रदेश के सभी 75 जिलों तक फैलाव. यह चुनाव दोनों ही दलों के लिए आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा लिटमस टेस्ट माना जा रहा है.
सीएम योगी की कमान और अखिलेश की नई रणनीति
लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद राज्य में राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है. भाजपा अपने विजय अभियान को जारी रखकर सपा के मनोवैज्ञानिक बढ़त के दावे को पछाड़ना चाहती है. इसी कड़ी में सीएम योगी आदित्यनाथ गोरखपुर और बरेली के बाद अब वाराणसी में जनसभाएं कर रहे हैं. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी हर हाल में अपने पक्ष में बने माहौल को बरकरार रखना चाहती है. यही वजह है कि अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव की तर्ज पर अंतिम समय में प्रत्याशी बदलकर भाजपा को चौंकाने का काम किया है.
ईवीएम बनाम बैलेट पेपर का बड़ा नैरेटिव
इस MLC चुनाव के नतीजों का असर दूरगामी होने वाला है. पहला बड़ा कारण है कि यह चुनाव ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से हो रहा है. यदि भाजपा यहां बड़ी जीत दर्ज करती है, तो वह विपक्ष के ‘ईवीएम धांधली’ के आरोपों की हवा निकाल सकती है. वहीं, अगर समाजवादी पार्टी जीतती है, तो उसे बैलेट पेपर और ईवीएम को लेकर अपने आरोपों को और धार देने का मौका मिल जाएगा.
बुद्धिजीवी वोटर और 75 जिलों का राजनीतिक मिजाज
इस चुनाव में केवल पढ़े-लिखे स्नातक और शिक्षक ही मतदान करते हैं, जिन्हें समाज का दिशा-निर्देशक माना जाता है. ऐसे में जो भी पार्टी जीतेगी, वह यह दावा कर सकेगी कि प्रदेश का पढ़ा-लिखा और प्रबुद्ध वर्ग उसके साथ खड़ा है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भले ही सीटें 11 हों, लेकिन इनके निर्वाचन क्षेत्र का फैलाव पूरे 75 जिलों तक है. इसलिए इस चुनाव के परिणाम को सीधे तौर पर आने वाले विधानसभा चुनाव का ‘पब्लिक मूड’ और बड़ा सर्वे माना जा रहा है.
-भारत एक्सप्रेस
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