Ahilyabai Holkar
जिस दौर में औरतों को पढ़ने-लिखने तक की इजाजत नहीं थी, वहीं एक साधारण गांव की लड़की ने इतिहास की धारा ही बदल दी. भेड़-बकरी चराने वाले परिवार की अहिल्याबाई होल्कर ने पति की मृत्यु, पुत्र की मृत्यु और समाज के विरोध के बावजूद मालवा की महारानी बनकर लगभग 28-30 वर्षों तक ऐसा शासन किया कि लोग आज भी उन्हें ‘लोकमाता’ और ‘पुण्यश्लोक’ कहकर याद करते हैं.
साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण यात्रा
अहिल्याबाई का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर (अब अहिल्यानगर) जिले के चौंडी गांव में एक धनगर (चरवाहा) परिवार में हुआ. उनके पिता मनकोजी शिंदे गांव के पाटिल थे. उस समय लड़कियों को शिक्षा देने का रिवाज नहीं था, फिर भी पिता ने उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया. संस्कृत, धर्म और नीतिशास्त्र का ज्ञान उन्होंने घर की चौखट पर बैठकर ही हासिल किया.
एक दिन मालवा के सूबेदार मल्हारराव होल्कर गांव से गुजर रहे थे. मंदिर में गरीबों को अन्न बांटती छोटी अहिल्या को देखकर वे प्रभावित हो गए. उन्होंने अपने पुत्र खण्डेराव होल्कर से उनका विवाह तय कर दिया. 1733 में मात्र आठ वर्ष की आयु में अहिल्याबाई होल्कर परिवार में आ गईं.
दुखों का सिलसिला और सत्ता की जिम्मेदारी
1754 में कुम्भेर के युद्ध में पति खण्डेराव की मृत्यु हो गई. अहिल्याबाई सती होने का विचार कर रही थीं, लेकिन ससुर मल्हारराव ने उन्हें रोका और प्रशासनिक-सैन्य कार्यों में प्रशिक्षित करना शुरू किया. 1766 में मल्हारराव का निधन हो गया. उनके बेटे मालेराव को गद्दी दी गई, लेकिन शीघ्र ही उनकी भी मृत्यु हो गई.
पेशवा की अनुमति से 11 दिसंबर 1767 को अहिल्याबाई ने मालवा की बागडोर संभाली. महेश्वर को राजधानी बनाया. समाज और दरबार में विरोध था-एक विधवा स्त्री कैसे राज्य चलाएगी? लेकिन अहिल्याबाई ने अपने कार्यों से सबका मुंह बंद कर दिया.
शासन और जनकल्याण
अहिल्याबाई का शासनकाल मालवा का स्वर्ण युग माना जाता है. उन्होंने न्याय, कर-व्यवस्था और प्रशासन को इतना सुव्यवस्थित किया कि राज्य में शांति और समृद्धि रही. वे स्वयं दरबार लगातीं, प्रजा की फरियाद सुनतीं और फैसला करतीं. थगों और लुटेरों के खिलाफ अभियान चलाया.
सबसे बड़ी ताकत थी जनता का विश्वास. उन्होंने सड़कें, कुएं, बावड़ियां, तालाब, घाट, धर्मशालाएं, अन्नसत्र और प्याऊ बनवाए. किसान, कारीगर और आम आदमी सभी को सुरक्षा और रोजगार मिला. भिल और गोंड जैसी जनजातियों को भी मुख्यधारा में शामिल किया.
महेश्वर में वस्त्र उद्योग को बढ़ावा दिया. बाहर से बुनकर बुलाए और ‘महेश्वरी साड़ी’ की परंपरा शुरू की, जो आज भी प्रसिद्ध है और महिलाओं को रोजगार देती है.
मंदिर, तीर्थ और संस्कृति की सेवा
अहिल्याबाई परम शिवभक्त थीं. उन्होंने न केवल अपने राज्य में बल्कि पूरे भारत में मंदिरों, घाटों और तीर्थस्थलों का निर्माण व जीर्णोद्धार करवाया. काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण, सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार, गया का विष्णुपद मंदिर, उज्जैन, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि स्थानों पर उनके कार्य आज भी मौजूद हैं.
कहा जाता है कि उन्होंने हजारों मंदिर, घाट, कुएं और धर्मशालाओं का निर्माण/पुनरुद्धार करवाया. कुछ स्रोतों में 1200 से अधिक और कुछ में और भी बड़ी संख्या बताई जाती है. उन्होंने धार्मिक स्थलों पर विद्वानों की नियुक्ति भी की ताकि शास्त्रों का अध्ययन-प्रचार हो.
नारी शक्ति का सच्चा रूप
अहिल्याबाई ने महिलाओं के लिए शिक्षा, संपत्ति के अधिकार और विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दों पर काम किया. वे स्वयं सादा जीवन जीती थीं- सफेद वस्त्र, कम आभूषण, नियमित पूजा-पाठ और कठोर दिनचर्या. ब्रिटिश इतिहासकार जॉन कीए ने उन्हें ‘दार्शनिक रानी’ (Philosopher Queen) कहा.
13 अगस्त 1795 को उनका निधन हो गया. वे 70 वर्ष की थीं. उनके बाद भी लोग उन्हें लोकमाता के रूप में पूजते रहे.
आज भी प्रेरणा
इतिहास में कई राजा हुए जिन्होंने राज्य बढ़ाए, लेकिन अहिल्याबाई ने लोगों का दिल जीता. वे सिर्फ शासक नहीं, मां थीं. सड़कें, कुएं, घाट, मंदिर और महेश्वरी साड़ी जैसी विरासत उनकी असली ताकत थी. जिस युग में स्त्रियों को घर की चारदीवारी में कैद रखा जाता था, वहां एक विधवा रानी ने पूरे भारत को जोड़ने का काम किया.
अहिल्याबाई होल्कर आज भी हमें याद दिलाती हैं कि सच्ची शक्ति पद या तलवार में नहीं, सेवा, न्याय और जनविश्वास में होती है. वे लोकमाता हैं, आदर्श शासक हैं और सच्ची नारी शक्ति का अमर प्रतीक.
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-भारत एक्सप्रेस
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