मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय की चर्चित किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ अब हिन्दी पाठकों तक भी पहुंचने जा रही है. किताब का हिन्दी संस्करण ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ नाम से प्रकाशित किया जा रहा है. इसे राजकमल प्रकाशन समूह ने प्रकाशित किया है, जबकि इसका हिन्दी अनुवाद प्रभात सिंह ने किया है.
इस किताब का लोकार्पण 18 जुलाई 2026 को पटना स्थित अर्थशिला में एक खास साहित्यिक समारोह के दौरान किया जाएगा. यह कार्यक्रम राजकमल प्रकाशन समूह और अर्थशिला की संयुक्त पहल ‘परस्पर: संवाद की सबरंगी दुनिया’ श्रृंखला का पहला आयोजन होगा. इस मौके पर साहित्य और संस्कृति जगत से जुड़ी कई जानी-मानी हस्तियां मौजूद रहेंगी.
अरुंधति रॉय और अनुवादक प्रभात सिंह होंगे मौजूद
किताब के विमोचन कार्यक्रम में खुद अरुंधति रॉय और अनुवादक प्रभात सिंह पाठकों और साहित्य प्रेमियों से रूबरू होंगे. इस दौरान कथाकार प्रत्यक्षा दोनों से किताब के विषय, लेखन प्रक्रिया और उससे जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं पर बातचीत करेंगी.
हिन्दी संस्करण के आने को लेकर अरुंधति रॉय ने खुशी जाहिर की है. उन्होंने बताया कि उनकी इस किताब का अनुवाद दुनिया की 45 से ज्यादा भाषाओं में हो चुका है, लेकिन अंग्रेजी, मलयालम और हिन्दी संस्करण उनके लिए खास महत्व रखते हैं.
अरुंधति रॉय ने कहा कि हिन्दी अनुवाद को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने प्रभात सिंह और राजकमल प्रकाशन के संपादकों के साथ मिलकर काफी समय तक काम किया. उन्होंने बताया कि किताब को अंतिम रूप देने के लिए लगातार दस दिनों तक रोज करीब दस-दस घंटे मेहनत की गई. रॉय ने खास तौर पर लड़कियों से इस किताब को पढ़ने की अपील की है.
अनुवाद करना आसान काम नहीं था- प्रभात सिंह
अनुवादक प्रभात सिंह के लिए भी यह किताब एक बड़ी चुनौती रही. उनका कहना है कि अरुंधति रॉय की लेखन शैली को हिन्दी में उसी प्रभाव और संवेदना के साथ उतारना बेहद जिम्मेदारी भरा काम था.
उन्होंने बताया कि रॉय की भाषा में गहराई, संकेतों और भावनाओं की कई परतें होती हैं. उनकी अभिव्यक्ति में मौजूद खास अंदाज, व्यंग्य और काव्यात्मकता को बनाए रखते हुए हिन्दी में पेश करना आसान नहीं था. प्रभात सिंह के मुताबिक अरुंधति रॉय शब्दों के इस्तेमाल में बेहद सजग रहती हैं, इसलिए अनुवाद में भी हर शब्द को बहुत सोच-समझकर चुनना पड़ा.
मां-बेटी के रिश्ते और आत्म-पहचान की कहानी
‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ सिर्फ एक मां और बेटी के रिश्ते की कहानी नहीं है. यह अरुंधति रॉय का बेहद निजी और भावनात्मक संस्मरण है, जिसमें वह अपनी मां मैरी रॉय के साथ अपने रिश्ते को याद करती हैं. इस रिश्ते में प्यार भी है, संघर्ष भी है और कई अनकहे सवाल भी हैं.
किताब में परिवार, मातृत्व, स्त्री की पहचान, समाज, सत्ता और अपने अस्तित्व को समझने की कोशिश जैसे मुद्दों पर गहराई से बात की गई है. इसमें निजी अनुभवों के साथ-साथ उस सामाजिक माहौल की भी झलक मिलती है, जिसने अरुंधति रॉय के व्यक्तित्व और सोच को आकार दिया.
अपनी अलग तरह की भाषा और बेबाक आत्मस्वीकृति के लिए पहचानी जाने वाली अरुंधति रॉय इस संस्मरण में अपने जीवन के उन पहलुओं को सामने लाती हैं, जिन्हें अक्सर लोग निजी दायरे में रखते हैं. यही वजह है कि इस किताब को दुनिया भर में आलोचकों और साहित्य प्रेमियों ने काफी सराहा है.
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