जन्मदिन विशेष: देश के पूर्व प्रधानमंत्री, प्रखर समाजवादी विचारक, धारा के खिलाफ अटल संघर्ष करने वाले और ‘युवा तुर्क’ के नाम से प्रसिद्ध चंद्रशेखर की जन्मशती वर्ष की आज शुरुआत हो गई.
17 अप्रैल 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे चंद्रशेखर की जीवन सिद्धांतों, वैचारिक दृढ़ता और निरंतर संघर्ष की अमिट गाथा रहा. वे आजीवन गरीबों, किसानों और वंचित वर्गों की आवाज बने रहे तथा व्यक्तिगत सत्ता से ऊपर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी.
राजनीतिक यात्रा
छात्रावस्था से ही समाजवादी विचारधारा से जुड़े चंद्रशेखर जी राम मनोहर लोहिया और अचार्य नरेंद्र देव जैसे नेताओं से प्रेरित हुए. 1962 में राज्यसभा सदस्य बने, फिर कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन सत्ता के आगे कभी नहीं झुके. आपातकाल (1975) के दौरान इंदिरा गांधी की नीतियों का खुला विरोध किया और जेल गए, जहां उन्होंने ‘जेल डायरी’ लिखी.

1983 में कन्याकुमारी से दिल्ली तक की ऐतिहासिक भारत यात्रा (लगभग 4260 किमी पदयात्रा) ने उन्हें जनता से जोड़ा. 1990 में वी.पी. सिंह सरकार गिरने के बाद उन्होंने जनता दल से अलग होकर समाजवादी जनता पार्टी बनाई और कांग्रेस के बाहरी समर्थन से 10 नवंबर 1990 को देश के प्रधानमंत्री बने.
साहस और कुर्बानी
अल्पकालिक कार्यकाल (लगभग 7-8 महीने) के बावजूद चंद्रशेखर जी ने आर्थिक संकट की घड़ी में साहसिक निर्णय लिया. विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की स्थिति में उन्होंने देश की साख बचाने के लिए सोना गिरवी रखने (pledging of gold) का कठिन फैसला लिया, ताकि भारत अंतरराष्ट्रीय डिफॉल्ट से बचे. उन्होंने कहा था कि उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था.
जब कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया (राजीव गांधी पर जासूसी के आरोप का हवाला देकर), तो उन्होंने सत्ता की कुर्सी से ऊपर अपनी गरिमा रखी. 6 मार्च 1991 को राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने इस्तीफा दे दिया और कहा कि वे किसी की कठपुतली नहीं बन सकते. यह उनकी राजनीतिक कुर्बानी का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है.
आलोचना के पहलू
चंद्रशेखर की विरासत में सकारात्मक योगदानों के साथ कुछ आलोचनाएं भी जुड़ी हैं :
- सोना गिरवी रखना: इस निर्णय की व्यापक आलोचना हुई. कई लोगों ने इसे राष्ट्रीय सम्मान पर आघात और आर्थिक प्रबंधन की असफलता का प्रतीक माना. यह फैसला गोपनीय रूप से चुनाव के दौरान लिया गया, जिससे सार्वजनिक आक्रोश बढ़ा. हालांकि, यह उस समय की मजबूरी थी, लेकिन विपक्ष और जनता ने इसे भारी पड़ने वाला कदम बताया.
- भोंडसी फार्म विवाद : उनके राजनीतिक करियर में अरावली वन क्षेत्र (भोंडसी, हरियाणा) में लगभग 500 एकड़ संरक्षित हरित पट्टी पर कथित अतिक्रमण का आरोप लगा. उनके ट्रस्ट द्वारा इस भूमि पर कब्जे को लेकर लंबे समय तक विवाद रहा और पर्यावरणीय चिंताएं उठाई गईं. वे इसे हमेशा बचाते रहे, लेकिन आलोचक इसे सत्ता और प्रभाव का दुरुपयोग मानते थे.
- राजनीतिक समझौते : समाजवादी होने के बावजूद उन्होंने कुछ विवादास्पद व्यक्तियों (जैसे कोयला माफिया से जुड़े नेता) को बढ़ावा दिया. वी.पी. सिंह सरकार गिराने और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बनने को भी अवसरवादी कदम माना गया. उनकी सरकार बजट पास नहीं करा पाई, जिससे क्रेडिट रेटिंग प्रभावित हुई और सुधारों की दिशा में ठोस कदम नहीं उठ सके.
ये आलोचनाएं दर्शाती हैं कि कोई भी नेता पूर्ण नहीं होता. चंद्रशेखर ने इन विवादों के बावजूद कभी सिद्धांतों से पूर्ण समझौता नहीं किया और अपनी शर्तों पर राजनीति की.

विरासत और प्रासंगिकता
आज चंद्रशेखर जी की सबसे बड़ी पहचान उनकी निडरता, वैचारिक स्पष्टता और सत्ता से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित सोचने की क्षमता थी. वे व्यक्तिपूजा और परिवारवाद के कट्टर विरोधी रहे. संसद में उनकी वक्तृता और साहस आज भी प्रेरणादायी है.
‘रहबरी के सवाल’ – नेतृत्व के प्रश्नों की गहन पड़ताल
चंद्रशेखर का जीवन भारतीय राजनीति का एक अनोखा अध्याय है – किसान पुत्र, समाजवादी विचारक, जेपी आंदोलन के योद्धा, ‘भारत यात्रा’ के प्रणेता और मात्र सात महीने के प्रधानमंत्री काल में भी सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने वाले नेता. उनकी जन्मशताब्दी पर देश भर में यादें ताजा हो रही हैं, लेकिन इस अवसर पर सबसे प्रासंगिक कृति है वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की पुस्तक ‘रहबरी के सवाल’ (राजकमल प्रकाशन, मूल संस्करण लगभग 2005, पुनर्प्रकाशन 2018, लगभग 350 पृष्ठ). यह पुस्तक चंद्रशेखर से किए गए विस्तृत साक्षात्कारों का संग्रह है, जो प्रश्नोत्तर शैली में उनकी 35 वर्षों की राजनीतिक यात्रा को खोलती है.

राम बहादुर राय, जो जेपी आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता रहे और बाद में पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘राय साहब’ के नाम से प्रसिद्ध हुए, ने इस पुस्तक में चंद्रशेखर से ‘रहबरी’ (नेतृत्व) के मूलभूत सवाल पूछे हैं. यह कोई पारंपरिक जीवनी नहीं है, बल्कि एक संवाद है – जहां राय साहब सवालों के जरिए चंद्रशेखर को उनकी खुद की राजनीतिक पसंद, गलतियों, सपनों और निराशाओं का सामना करवाते हैं. पुस्तक के छह खंड स्पष्ट रूप से संरचित हैं: इनमें चंद्रशेखर के शब्दों में उनके जीवन के प्रमुख पड़ाव उभरते हैं – कांग्रेस में प्रवेश, इंदिरा गांधी से टकराव, संपूर्ण क्रांति, जनता पार्टी, भारत यात्रा, जनता दल, प्रधानमंत्री पद और उसके बाद की सजपा.
ईमानदारी और प्रामाणिकता की ताकत
पुस्तक की सबसे बड़ी ताकत इसकी ईमानदारी और प्रामाणिकता है. चंद्रशेखर यहां कोई राजनेता की छवि नहीं चमकाते, बल्कि खुलकर कहते हैं कि चुनावी राजनीति में उतरना उनकी सबसे बड़ी गलती थी. भारत यात्रा के बाद जब वे युवाओं और आम लोगों से जुड़े थे, तब चुनावी मैदान में कूदने से वे ‘मंजिल’ से ज्यादा ‘सफर’ भटक गए. वे स्वीकार करते हैं कि सिस्टम में गड़बड़ी नहीं, हम लोग गड़बड़ हो गए हैं. संसद को ‘मछली बाजार’ कहने वाले चंद्रशेखर यहां भी बिना लाग-लपेट के बोलते हैं – लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम सोचते कुछ और हैं, कहते दूसरी बात.
एक रोचक प्रसंग में राम बहादुर राय पूछते हैं – क्या सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का त्याग किया? चंद्रशेखर का जवाब करिश्माई है: “तेरह तारीख को जब 14वीं लोकसभा के परिणाम आए, तब सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनने को तैयार थीं. 17 तारीख को यूपीए की लीडर चुनी गईं, तब भी तैयार थीं. 18 तारीख को राष्ट्रपति से मिलने के बाद क्या हो गया? मैं तो इसे करिश्मा ही समझता हूं कि कलाम साहब के दर्शन मात्र से कोई त्यागी हो जाता है.” वे आगे कहते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी नीति के स्तर पर एक ही थे दोनों अमेरिका समर्थक.

इसी तरह वे अपने प्रधानमंत्री इस्तीफे पर भी ईमानदार हैं. राजीव गांधी के साथ सरकार नहीं चल सकने पर उन्होंने इस्तीफा दे दिया. वे कहते हैं,
“मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा था कि प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया?”
लेकिन फिर जोड़ते हैं कि सिस्टम में चपरासी के साथ अन्याय करने वाला नेता देश के साथ भी अन्याय कर सकता है. यह आत्मालोचना और सिद्धांत-निष्ठा का दुर्लभ मिश्रण है.
पुस्तक की प्रशंसा में प्रभाष जोशी ने भूमिका लिखी थी कि 35 साल के कालखंड के आकलन पर बनी किसी भी किताब में चंद्रशेखर वैसे नहीं निकले जैसे इन सवालों के जरिए. राजनीति के गंभीर अध्येताओं के लिए यह प्रामाणिक दस्तावेज है. चंद्रशेखर का जीवन ‘भारतीय किसान’ जैसा खुला और बिना दुराव-छिपाव का था, और पुस्तक ठीक उसी स्वर में बोलती है.
कांग्रेस और गांधी परिवार पर टिप्पणी
हालांकि ‘रहबरी के सवाल’ को ज्यादातर सकारात्मक समीक्षा मिली है, लेकिन कुछ आलोचक इसे ‘एकतरफा’ मानते हैं. चूंकि यह चंद्रशेखर के अपने शब्दों का संग्रह है, इसलिए इसमें विपक्षी दृष्टिकोण या अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाएं शामिल नहीं हैं. कुछ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि चंद्रशेखर की ईमानदारी के साथ-साथ उनकी कुछ टिप्पणियां व्यक्तिगत निराशा या पुरानी खटास से प्रभावित लगती हैं. खासकर कांग्रेस, गांधी परिवार या वाजपेयी पर. उदाहरण के लिए, सोनिया-वाजपेयी को ‘एक’ बताने वाली टिप्पणी को कुछ लोग अतिशयोक्ति मानते हैं.

कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि पुस्तक चंद्रशेखर की ‘ब्रांड इमेज’ को निखारने का प्रयास लगती है – वे खुद को ‘सच्चा समाजवादी’ के रूप में पेश करते हैं, जबकि उनकी सरकार के दौरान आईएमएफ ऋण और आर्थिक नीतियों पर सवाल उठे थे. राम बहादुर राय की संवाद शैली की तारीफ तो सब करते हैं, लेकिन कुछ का मानना है कि साक्षात्कारों में ‘कठिन सवाल’ कम और ‘सहानुभूतिपूर्ण’ ज्यादा थे. फिर भी, ये आलोचनाएं पुस्तक की ऐतिहासिक मूल्य को कम नहीं करतीं. यह 1970 के बाद की भारतीय राजनीति को समझने का एक विश्वसनीय स्रोत है.
चंद्रशेखर की जन्मशताब्दी वर्ष में ‘रहबरी के सवाल’ को दोबारा पढ़ना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सवालों की पड़ताल है – नेतृत्व क्या है? सत्ता में रहते हुए सिद्धांतों का पालन कैसे संभव है? और सबसे बड़ा सवाल क्या आज भी कोई नेता इतनी खुली ईमानदारी से अपनी गलतियां स्वीकार कर सकता है?
प्रासंगिक सवालों की ताकत
राम बहादुर राय ने चंद्रशेखर से जो सवाल पूछे, वे आज भी प्रासंगिक हैं. यह पुस्तक चंद्रशेखर को ‘युवा तुर्क’ से ‘अकेला विद्रोही’ तक की यात्रा में ले जाती है और हमें याद दिलाती है कि सच्ची रहबरी सवाल पूछने और जवाब देने की हिम्मत में छिपी है. जन्मशताब्दी के इस वर्ष में यह कृति न सिर्फ चंद्रशेखर को याद कराती है, बल्कि भारतीय राजनीति को आत्ममंथन के लिए आमंत्रित भी करती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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