संसद का ऊपरी सदन ‘राज्यसभा’, मुल्क की दशा-दिशा पर गंभीर वाद-विवाद और मंथन का मंच है. यह नीति-निर्माण की सशक्त परंपरा को स्वरूप देने वाला संस्थान है. इसी सदन में चिंतन, संवाद और सरोकार को जीवंत बनाए रखने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति को 12 सदस्यों को नामित करने का अधिकार दिया गया है. ऐसे व्यक्तियों को, जिन्होंने साहित्य, विज्ञान, कला या समाजसेवा के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया हो, ताकि उनके अनुभव का लाभ सदन और देश को मिल सके.
इसी संवैधानिक प्रावधान के तहत पत्रकारिता और लेखन में उनके विशिष्ट योगदान के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा नामित सदस्यों में सबसे ताजा नाम ‘हरिवंश नारायण सिंह’ का जुड़ा है. करीब चार दशक की पत्रकारिता और उससे उपजे लेखन के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय विमर्श को अनेक आयाम दिए हैं. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा 10 अप्रैल 2026 को उनका नामांकन इस बात का संकेत है कि लोकतंत्र केवल संख्या बल से नहीं, बल्कि विवेक की गहराई से भी संचालित होता है.
नामांकन क्यों है प्रमाणिक निर्णय?
राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होने से पहले ही हरिवंश राज्यसभा में दो कार्यकाल (कुल 12 वर्ष) पूरा कर चुके हैं. इस दौरान उनकी पहचान एक पत्रकार-लेखक के रूप में और भी सुदृढ़ हुई. उन्होंने संसदीय जीवन में आने के बाद भी लेखन जारी रखा और उसे नए आयाम दिए.
राज्यसभा में उन्होंने लगभग चार वर्ष सांसद और आठ वर्ष उपसभापति के रूप में कार्य किया. इस दौरान उन्होंने सदन की गरिमा, मर्यादा और अनुशासन बनाए रखने का प्रयास किया, विशेषकर तब जब सदन में व्यवधान आम बात हो गई थी. एक पत्रकार-लेखक के रूप में अर्जित अनुभव का उपयोग उन्होंने सदन संचालन में किया.
उनका व्यक्तित्व और दृष्टिकोण उनके जीवन-संघर्ष से निर्मित हुआ है. बिहार के सिताबदियारा गांव (जो जयप्रकाश नारायण की कर्मभूमि रहा) से निकलकर उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की. बाद में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर किया तथा पत्रकारिता में प्रशिक्षण प्राप्त किया.
पत्रकारिता से संसद तक
हरिवंश का पत्रकारिता में प्रवेश The Times of India समूह से हुआ, जहां उन्होंने ‘धर्मयुग’ में उपसंपादक के रूप में कार्य किया. बाद में बैंकिंग क्षेत्र में भी गए, लेकिन पत्रकारिता के प्रति लगाव के कारण वापस लौट आए.
उन्होंने ‘रविवार’ पत्रिका और बाद में ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक के रूप में लंबा कार्यकाल बिताया. उनके नेतृत्व में ‘प्रभात खबर’ ने क्षेत्रीय अखबार से राष्ट्रीय पहचान बनाई. चारा घोटाले जैसे मामलों की खोजी पत्रकारिता से लेकर सामाजिक न्याय के मुद्दों तक, उनकी लेखनी सक्रिय रही.
1990-91 में वे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के मीडिया सलाहकार भी रहे, लेकिन फिर पत्रकारिता में लौट आए.
संसदीय योगदान और दृष्टि
2014 में राज्यसभा सदस्य बनने के बाद और 2018 से 2026 तक उपसभापति रहते हुए उन्होंने संयमित और संतुलित भूमिका निभाई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके व्यवहार को ‘मृदुभाषी और विश्वास अर्जित करने वाला’ बताया.
उन्होंने देश के 21 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों का दौरा कर स्थानीय समुदायों से संवाद किया. ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य में राज्यों की भूमिका पर बल दिया. साथ ही कई संसदीय प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व भी किया.
ज्ञान-आधारित विकास की सोच
उन्होंने अपनी सांसद निधि (MPLADS) का उपयोग अल्पकालिक निर्माण के बजाय दीर्घकालिक ज्ञान-केंद्र स्थापित करने में किया. उदाहरणस्वरूप:
- IIT पटना में भूकंप इंजीनियरिंग रिसर्च सेंटर
- आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी में नदी अध्ययन केंद्र
- जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के लिए डिजिटल केंद्र
- एआई और बिजनेस इंक्यूबेशन सेंटर
उनकी सोच ‘ये ज्ञान का युग है, और ज्ञान ही समाज को बदलता है’ स्पष्ट थी.
लेखन और वैचारिक योगदान
चार दशक से अधिक की पत्रकारिता और 24 से अधिक पुस्तकों के माध्यम से हरिवंश ने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर गहन विचार प्रस्तुत किए. ‘भारत किधर’, ‘बिहार किधर’, ‘झारखंड किधर’ जैसी शृंखलाएं उनके विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं.
उनकी पत्रकारिता पर अकादमिक अध्ययन भी हुए हैं, जो उनके कार्य को ‘जन सरोकार की पत्रकारिता’ का उदाहरण मानते हैं.
निष्कर्ष
हरिवंश केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक विचारक, लेखक और संवादधर्मी व्यक्तित्व हैं. उनका चयन यह दर्शाता है कि लोकतंत्र में विवेक, अनुभव और वैचारिक गहराई का भी उतना ही महत्व है जितना संख्या बल का.
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-भारत एक्सप्रेस
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