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मंच नहीं, जंगल चुना! अरावली की छांव में पौधे लगाते हुए लॉन्च हुई ‘पीपल बाबा’ की नई किताब

गुरुग्राम के अरावली जंगल में पेड़ों के बीच जब स्वामी प्रेम परिवर्तन की किताब ‘पीपल की छाँव में’ का लोकार्पण किया गया, तो यह सिर्फ एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि प्रकृति के साथ एक भावनात्मक संवाद जैसा महसूस हुआ.

गुरुग्राम के अरावली इलाके में उस वक्त एक अलग ही नज़ारा देखने को मिला, जब घने पेड़ों के बीच पर्यावरण और साहित्य का संगम हुआ. मशहूर पर्यावरणविद् स्वामी प्रेम परिवर्तन, जिन्हें लोग प्यार से ‘पीपल बाबा’ के नाम से जानते हैं, की नई किताब ‘पीपल की छांव में’ का लोकार्पण किसी हॉल या मंच पर नहीं, बल्कि सीधे जंगल के बीच पौधे लगाते हुए किया गया. इस खास मौके पर पर्यावरण प्रेमियों और प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों ने मिलकर करीब 100 पौधे लगाए.

यह किताब पेंगुइन स्वदेश ने प्रकाशित की है, और इस आयोजन में पेंगुइन की टीम के साथ-साथ ‘गीव मी ट्रीज़’ संगठन के वॉलिंटियर्स भी बड़ी संख्या में मौजूद रहे.

पेड़ों के बीच किताब का लोकार्पण

इस कार्यक्रम की सबसे खास बात यही रही कि किताब का लॉन्च भी उसी विचार के साथ किया गया, जिस पर लेखक ने अपना पूरा जीवन खड़ा किया है. विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर हुए इस आयोजन में जंगल के भीतर पौधारोपण करते हुए किताब को लोगों के सामने रखा गया.

पीपल बाबा ने इस मौके पर कहा कि जब हम एक पौधा लगाते हैं, तो सिर्फ एक पेड़ नहीं उगाते, बल्कि एक पूरा जीवनचक्र शुरू करते हैं. उनके मुताबिक हर पेड़ अपने आप में एक छोटी-सी दुनिया है, जहाँ अनगिनत जीव-जंतु, कीट और प्राकृतिक प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं.

‘प्रकृति से दूरी बढ़ रही है’: पीपल बाबा की चिंता

अपने संबोधन में उन्होंने आज के समय पर भी गंभीर सवाल उठाए. उनका कहना था कि आधुनिकता की दौड़ में इंसान धीरे-धीरे प्रकृति और अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है. उन्होंने जोर देकर कहा कि पर्यावरण बचाने के लिए सबसे जरूरी चीज़ जागरूकता और शिक्षा है, खासकर नई पीढ़ी को मिट्टी और पेड़ों से जोड़ना.

उनका मानना है कि उनका मिशन सिर्फ पौधे लगाना नहीं है, बल्कि लोगों के मन में प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना पैदा करना है, ताकि भविष्य में एक संतुलित और हरित दुनिया तैयार हो सके.

50 साल की यात्रा, एक किताब के रूप में

‘पीपल की छाँव में’ सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि लगभग पांच दशकों की जीवन यात्रा का दस्तावेज है. इसमें उनके अनुभव, यादें और देशभर में किए गए वृक्षारोपण अभियानों की कहानियाँ शामिल हैं.

किताब की खासियत यह भी है कि इसमें उनके निजी नोट्स, डायरी के पन्ने, पुराने कागज़ों और यादों के टुकड़ों से जुड़ी कहानियाँ हैं, जो पाठक को देहरादून की गलियों से लेकर पुणे की हरियाली तक ले जाती हैं. इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे उनकी नानी की लोककथाओं और एक स्कूल टीचर के प्रभाव ने उनके जीवन की दिशा बदल दी.

‘पेंगुइन फॉरेस्ट’ की भी घोषणा

इसी मौके पर ‘पेंगुइन फॉरेस्ट’ की स्थापना की गई’. पीपल बाबा ने बताया कि हरियाणा सरकार के साथ मिलकर एक ऐसी जगह चिन्हित की जाएगी, जहां यह अनोखा वन तैयार होगा. इस फॉरेस्ट में किताबों और पेड़ों का एक अनोखा मेल देखने को मिलेगा, जहाँ लेखक, प्रकाशक और पर्यावरण प्रेमी एक साथ संवाद कर सकेंगे.

इस पूरे आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि पेड़ लगाना केवल एक पर्यावरणीय काम नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और भावनात्मक जिम्मेदारी भी है. पीपल बाबा का कहना है कि पीपल का पेड़ सिर्फ एक वृक्ष नहीं, बल्कि जीवन, ऊर्जा और चेतना का प्रतीक है और इसी सोच को वे आज के समय में फिर से लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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