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1999 का कारगिल युद्ध, प्लेन हाईजैक ड्रामा और आगरा सम्मेलन, जानें कैसे तानाशाह मुशर्रफ का हुआ अपमानजनक अंत

कारगिल युद्ध के मास्टरमाइंड परवेज मुशर्रफ ने तख्तापलट कर 9 साल तक पाकिस्तान पर राज किया. बाद में देशद्रोह के केस और निर्वासित जीवन बिताते हुए 2023 में दुबई में उनका निधन हो गया.

History Of Pervez Musharraf Kargil War Military Coup And Downfall Bharat Express
Edited by Vaibhav Gupta

ऑपरेशन सफेद सागर (1999 का कारगिल युद्ध) भारत की वायुसेना का वह अभियान था जिसने पाकिस्तानी घुसपैठियों को कारगिल की ऊंचाइयों से खदेड़ दिया. इस युद्ध के मुख्य वास्तुकार पाकिस्तान के तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ थे. युद्ध पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तर पर भारी विफलता साबित हुआ. इसके बाद मुशर्रफ के जीवन और पाकिस्तान की राजनीति में जो नाटकीय घटनाएं घटीं, वे इतिहास में दर्ज हो गईं.

कारगिल की विफलता और तख्तापलट की तैयारी

कारगिल अभियान के दौरान मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पूरी तरह से विश्वास में नहीं लिया था. कई रिपोर्टों के अनुसार, यह अभियान मुशर्रफ और कुछ चुनिंदा जनरलों (गैंग ऑफ फोर) द्वारा गुप्त रूप से चलाया गया था. भारत की सफलता और अंतरराष्ट्रीय दबाव (खासकर अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के हस्तक्षेप) के बाद पाकिस्तान को पीछे हटना पड़ा.

इस हार के बाद नवाज शरीफ और मुशर्रफ के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया. शरीफ मुशर्रफ को कारगिल की विफलता का जिम्मेदार ठहरा रहे थे और उनके खिलाफ संभावित कोर्ट मार्शल की चर्चा चल रही थी. मुशर्रफ ने अपने सहयोगियों से मार्शल लॉ की तैयारी करने को कहा. सितंबर 1999 में शरीफ ने मुशर्रफ के कार्यकाल को प्रमाणित कर तनाव कम करने की कोशिश की, लेकिन अफवाहें जारी रहीं.

12 अक्टूबर 1999 का सैन्य तख्तापलट

अक्टूबर 1999 में मुशर्रफ श्रीलंका की यात्रा पर थे. नवाज शरीफ ने उन्हें आर्मी चीफ पद से हटाने और लेफ्टिनेंट जनरल जियाउद्दीन को नियुक्त करने का फैसला लिया. मुशर्रफ का विमान जब कराची लौट रहा था, तो शरीफ ने उसे लैंडिंग की अनुमति न देने और यहां तक कि भारत की ओर मोड़ने का आदेश दिया.

पाकिस्तान सेना ने विद्रोह कर दिया. सैनिकों ने हवाई अड्डे के कंट्रोल टॉवर पर कब्जा कर लिया, शरीफ को नजरबंद कर दिया और मुशर्रफ के विमान को सुरक्षित उतरने दिया. 12-13 अक्टूबर की रात मुशर्रफ ने सत्ता संभाल ली. 15 अक्टूबर को उन्होंने आपातकाल घोषित कर संविधान निलंबित कर दिया और खुद को चीफ एग्जीक्यूटिव घोषित किया. बाद में वे राष्ट्रपति बने. नवाज शरीफ को अंततः सऊदी अरब निर्वासित कर दिया गया.

यह पाकिस्तान का चौथा सैन्य तख्तापलट था और मुशर्रफ लगभग नौ साल तक सत्ता में रहे.

भारत यात्रा और आगरा शिखर सम्मेलन की विफलता

कारगिल के बाद भारत-पाकिस्तान संबंध बेहद तनावपूर्ण थे. फिर भी 2001 में गुजरात भूकंप के बाद मुशर्रफ ने सहायता भेजकर थोड़ी नरमी दिखाई. जुलाई 2001 में वे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने आगरा पहुंचे. यह उनका भारत का पहला आधिकारिक दौरा था.

दोनों नेताओं के बीच कश्मीर, सीमा पार आतंकवाद, परमाणु मुद्दे और कैदियों के आदान-प्रदान पर चर्चा हुई. लेकिन बैठकें गतिरोध में फंस गईं. मुशर्रफ ने मीडिया से मुलाकात में कश्मीर पर जोर दिया, जबकि भारत पक्ष ने आतंकवाद और कारगिल के घावों को प्रमुखता दी. मुशर्रफ नाराज होकर सम्मेलन छोड़कर चले गए. जल्द ही दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमला हुआ, जिसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव (ऑपरेशन पराक्रम) बढ़ गया.

सत्ता से पतन, देशद्रोह के आरोप और निर्वासन

2007 में मुशर्रफ ने एक बार फिर आपातकाल लगाया, संविधान निलंबित किया और मुख्य न्यायाधीश सहित कई जजों को हटाया. इससे उनके खिलाफ विरोध बढ़ गया. 2008 के चुनावों में उनकी समर्थक पार्टी हारी और महाभियोग का खतरा मंडराने लगा. अगस्त 2008 में उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया.

इसके बाद वे लंदन और दुबई में निर्वासन में चले गए. 2013 में चुनाव लड़ने के इरादे से पाकिस्तान लौटे, लेकिन अदालत ने उन्हें अयोग्य करार दिया और 2007 के आपातकाल के लिए उच्च देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया. 2016 में वे इलाज के नाम पर दुबई चले गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे. 2019 में एक विशेष अदालत ने उन्हें अनुपस्थिति में मौत की सजा सुनाई (बाद में इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया गया).

5 फरवरी 2023 को दुबई में अमाइलॉयडोसिस नामक दुर्लभ बीमारी से 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार कराची में सैन्य सम्मान के साथ किया गया.

कारगिल की विफलता ने मुशर्रफ को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया, लेकिन उसी महत्वाकांक्षा और निरंकुशता ने उन्हें अपमानजनक पतन की ओर धकेल दिया. वे पाकिस्तान के इतिहास में सैन्य तानाशाह के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने एक ओर कारगिल जैसी साहसिक (और विनाशकारी) कार्रवाई की, तो दूसरी ओर भारत के साथ शांति की कोशिशें भी कीं, जो अंततः असफल रहीं. उनका जीवन दक्षिण एशिया की जटिल राजनीति, सैन्य हस्तक्षेप और लोकतंत्र की नाजुकता का जीवंत उदाहरण है.

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-भारत एक्सप्रेस



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