भारत से हजारों किलोमीटर दूर हिंद महासागर में बसा मॉरीशस आज अपनी खूबसूरती, संस्कृति और भारतीय परंपराओं के लिए जाना जाता है. लेकिन इस देश के इतिहास में एक ऐसा अध्याय भी है, जिसकी शुरुआत भारतीय मजदूरों के संघर्ष और मेहनत से हुई थी. तारीख थी 2 नवंबर 1834. इसी दिन 36 भारतीय मजदूर समुद्र का लंबा सफर तय करके मॉरीशस के पोर्ट लुईस पहुंचे थे. इन मजदूरों का आगमन सिर्फ एक यात्रा नहीं था, बल्कि उस ऐतिहासिक प्रवास की शुरुआत थी, जिसने आगे चलकर मॉरीशस की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को बदल दिया.
आज इसी ऐतिहासिक घटना की याद में मॉरीशस में हर साल 2 नवंबर को ‘अप्रवासी दिवस’ मनाया जाता है. यह दिन वहां राष्ट्रीय अवकाश के रूप में भी दर्ज है.
कैसे शुरू हुआ भारतीय मजदूरों का मॉरीशस जाना?
19वीं सदी में ब्रिटिश शासन वाले कई क्षेत्रों में गुलामी की प्रथा समाप्त होने लगी थी. इसके बाद चीनी के बड़े-बड़े खेतों और कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की कमी महसूस होने लगी. इस कमी को पूरा करने के लिए अंग्रेजों ने भारत से मजदूरों को अनुबंध के आधार पर दूसरे देशों में भेजना शुरू किया.
इसी सिलसिले में ब्रिटिश ट्रेडिंग कंपनी हंटर-आर्बुथ्नॉट एंड कंपनी ने 10 सितंबर 1834 को कलकत्ता में 36 भारतीय मजदूरों के साथ पांच साल का अनुबंध किया था. यह समझौता बंगाली भाषा में लिखा गया था.
उस समय तय की गई मजदूरी भी काफी कम थी. पुरुष मजदूरों को हर महीने 5 रुपये, महिलाओं को 4 रुपये और मजदूरों की देखरेख करने वाले सरदार को 10 रुपये देने का प्रावधान था. इस सरदार का नाम स्वरुप (Sooroop) बताया जाता है.
इन मजदूरों में कैलाशचंद, दूखन, भुमराह, बुद्धू, बिगना, चम्पा, लुगन और बुद्धराम जैसे नाम शामिल थे. इनमें से ज्यादातर मजदूर बिहार के पहाड़ी इलाकों से ताल्लुक रखते थे. उस समय वे रोजगार की तलाश में कलकत्ता में रहकर काम कर रहे थे.
छह सप्ताह की समुद्री यात्रा के बाद पहुंचे मॉरीशस
15 सितंबर 1834 को इन 36 मजदूरों ने ‘एटलस’ नाम के जहाज पर सवार होकर मॉरीशस के लिए यात्रा शुरू की. उस दौर में समुद्र के रास्ते इतनी लंबी दूरी तय करना आसान नहीं था. करीब छह सप्ताह के सफर के बाद 2 नवंबर को जहाज पोर्ट लुईस पहुंचा. अगले दिन मजदूरों को औपचारिक रूप से जहाज से उतारा गया.
शायद उस समय इन मजदूरों को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उनकी यह यात्रा आने वाली पीढ़ियों के इतिहास का इतना बड़ा हिस्सा बन जाएगी.
लाखों भारतीयों ने बदली मॉरीशस की तस्वीर
36 मजदूरों से शुरू हुआ यह सिलसिला धीरे-धीरे बड़े प्रवास में बदल गया. उपलब्ध ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, 1834 से 1910 के बीच करीब 4,51,796 भारतीय अनुबंधित मजदूर मॉरीशस पहुंचे. इनमें लगभग 3,46,036 पुरुष और 1,05,760 महिलाएं थीं.
इनमें से करीब 2,94,000 लोगों ने मॉरीशस को ही अपना घर बना लिया. बाकी लोग भारत लौट गए या दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटिश गुयाना, त्रिनिदाद और फिजी जैसे दूसरे देशों में चले गए.
इन भारतीयों में बड़ी संख्या बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी भाषी इलाकों, तमिलनाडु, तेलुगु भाषी क्षेत्रों और महाराष्ट्र से आई थी.
इन मजदूरों को ‘गिरमिटिया’ कहा जाने लगा. दरअसल, अंग्रेजी के शब्द ‘एग्रीमेंट’ को बोलचाल में ‘गिरमिट’ कहा जाता था. इसी समझौते के तहत विदेश भेजे जाने वाले भारतीय मजदूर गिरमिटिया कहलाए.
कठिन हालात में भी नहीं छोड़ी अपनी पहचान
मॉरीशस पहुंचने के बाद इन मजदूरों की जिंदगी आसान नहीं थी. उन्हें चीनी के खेतों में लंबे समय तक काम करना पड़ता था. काम के घंटे कठिन थे, नियम सख्त थे और अधिकार भी सीमित थे. कई मजदूरों को शोषण और मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा.
इसके बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत से मॉरीशस की कृषि और चीनी उद्योग को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया. साथ ही अपनी भाषा, खानपान, धार्मिक परंपराओं, लोकगीतों और सामाजिक रीति-रिवाजों को भी जिंदा रखा.
आज मॉरीशस में भोजपुरी भाषा और भारतीय संस्कृति की मजबूत मौजूदगी इसी ऐतिहासिक जुड़ाव की निशानी है. वहां भारतीय मूल के लोगों की आबादी करीब 65 से 70 प्रतिशत बताई जाती है. हिंदू समुदाय भी देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है.
यही वजह है कि मॉरीशस को कई बार ‘छोटा भारत’ भी कहा जाता है.
गिरमिटिया परिवार से निकले मॉरीशस के राष्ट्रपिता
इस ऐतिहासिक प्रवास का प्रभाव सिर्फ आम लोगों की जिंदगी तक सीमित नहीं रहा. मॉरीशस के पहले प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम का परिवार भी इसी भारतीय प्रवासी इतिहास से जुड़ा था. उनके पिता गिरमिटिया मजदूर के रूप में भारत से मॉरीशस पहुंचे थे.
बाद में शिवसागर रामगुलाम ने देश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्हें मॉरीशस में राष्ट्रपिता के रूप में सम्मान दिया जाता है. उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि कभी मजदूरी करने के लिए समुद्र पार पहुंचे भारतीय परिवारों की अगली पीढ़ियों ने नए देश के निर्माण में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
अप्रवासी घाट आज भी सुनाता है उन मजदूरों की कहानी
मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुईस में स्थित अप्रवासी घाट (Aapravasi Ghat) इस पूरे इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण निशानियों में से एक है. यही वह ऐतिहासिक स्थान है, जहां भारत से आए हजारों अनुबंधित मजदूरों ने कदम रखा था.
आज यह स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है. हर साल 2 नवंबर को यहां उन सभी भारतीय मजदूरों को याद किया जाता है, जिन्होंने अपना घर-परिवार छोड़कर एक अनजान देश में नई जिंदगी शुरू की थी. इस मौके पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और स्कूलों, कॉलेजों तथा सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है.
2 नवंबर 1834 का दिन हमें उन हजारों भारतीय परिवारों की याद दिलाता है, जिन्होंने बेहतर रोजगार और नए जीवन की उम्मीद में अपना देश छोड़ा था. इनमें से कई लोगों ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया, अपनों से दूर रहे और अपनी मेहनत से एक नए समाज को आकार दिया.
आज मॉरीशस की भाषा, संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक पहचान में भारतीयों का योगदान साफ दिखाई देता है. इसलिए अप्रवासी दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उन गुमनाम मजदूरों के संघर्ष, साहस और योगदान को सम्मान देने का भी दिन है.
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