2 जनवरी, 1975, आजादी के बाद भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय जो आज भी रहस्यों से घिरा हुआ है. इसी दिन बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर एक बम विस्फोट में केंद्रीय रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या हो गई थी. वे भारत के पहले केंद्रीय मंत्री थे, जिनकी हत्या हुई. इस वर्ष इस हत्याकांड को पूरे 50 वर्ष हो गए.
मिथिला की मिट्टी से निकला सितारा
ललित नारायण मिश्र का जन्म 2 फरवरी, 1923 को बिहार के सुपौल जिले के बसनपट्टी गांव में हुआ था. युवावस्था में ही उन्होंने कांग्रेस पार्टी से जुड़कर राजनीतिक पथ पर कदम रखा, जो आगे चलकर उनके उत्थान का आधार बनी.
राजनीतिक यात्रा
ललित नारायण मिश्र की राजनीतिक यात्रा 1952 में शुरू हुई, जब वे पहली बार लोकसभा के सदस्य चुने गए. बिहार से प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने 1952-1962 तक लोकसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज की. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार में वे खाद्य एवं कृषि मंत्री के संसदीय सचिव बने. उनकी कुशलता और मेहनत ने इंदिरा गांधी का ध्यान आकर्षित किया, जो बाद में उनकी राजनीतिक उड़ान का प्रमुख कारण बनीं.
1967 में वे गृह राज्य मंत्री बने और 1971 में फिर से लोकसभा सदस्य चुने गए. 1973 में इंदिरा गांधी ने उन्हें रेल मंत्रालय का जिम्मा सौंपा. इस दौरान उन्होंने रेलवे के आधुनिकीकरण पर जोर दिया. बिहार जैसे पिछड़े राज्य से आने वाले एक नेता के रूप में वे रेल नेटवर्क के विस्तार और यात्री सुविधाओं में सुधार के लिए जाने जाते थे. हालांकि, उनके कार्यकाल में कुछ विवाद भी जुड़े, जैसे फंड जुटाने के आरोप, जो उन्हें इंदिरा की ‘निकटतम’ के रूप में चित्रित करते थे.
समस्तीपुर का काला दिन
2 जनवरी, 1975 को ललित नारायण मिश्र समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर ब्रॉड गेज रेल लाइन के उद्घाटन के लिए पहुंचे थे. एक साधारण समारोह जो इतिहास के पन्नों में खून से सन गया. स्टेशन पर एक बम विस्फोट हुआ, जिसमें मिश्र गंभीर रूप से घायल हो गए. उन्हें तत्काल पटना मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, लेकिन अगले दिन 3 जनवरी को उनकी मृत्यु हो गई. यह घटना पूरे देश को स्तब्ध कर गई. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे ‘साजिश’ करार दिया और जांच के आदेश दिए.
हालांकि, हत्या से ठीक एक रात पहले मिश्र ने एक पत्रकार से कहा था कि उन्हें खतरे का अहसास है. यह रहस्यमयी बयान आज भी सवाल खड़े करता है. जांच में आनंद मार्ग के सदस्यों का नाम आया, जिन्हें कथित रूप से राजनीतिक साजिश का हिस्सा माना गया. लेकिन यह हत्या राजनीतिक दुश्मनी, क्षेत्रीय विवाद या कुछ और का नतीजा था. यह आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं.
लंबी कानूनी जंग: न्याय की प्रतीक्षा
मिश्र हत्याकांड की जांच लंबे समय तक चली. सीबीआई ने कई गवाहों और सबूतों की पड़ताल की, लेकिन मुकदमा 39 वर्षों तक कोर्ट में लंबित रहा. आखिरकार, घटना के 40 साल बाद 8 दिसंबर, 2014 को अदालत ने ‘आनंदमार्ग’ से संबंधित चार लोगों सच्चिदानंद अवधूत, सुदेवानंद अवधूत, गोपालजी और रंजन द्विवेदी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई.
चारों अभियुक्त इस समय जमानत पर रिहा हैं. इस समय मामला दिल्ली हाइकोर्ट में है जहां अभियुक्तों की अपील पर अदालत विचार कर रही है.
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-भारत एक्सप्रेस
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