29 अगस्त 1926 को उत्तर कन्नड़ जिले के सिद्धपुर में एक हव्यक ब्राह्मण परिवार में जन्मे रामकृष्ण महाबलेश्वर हेगड़े अगर आज जीवित होते तो 100 वर्ष के हो जाते.
मैसूर राज्य के कर्नाटक बनने के बाद राज्य में अब तक अलग-अलग पार्टियों से 18 मुख्यमंत्री बन चुके हैं. इस सूची में रामकृष्ण हेगड़े तीसरे नंबर पर हैं, लेकिन अपनी राजनीतिक शैली और मूल्यों के कारण वे अपने दौर के अधिकांश नेताओं से अलग खड़े दिखते हैं.
कौन हैं रामकृष्ण महाबलेश्वर हेगड़े?
रामकृष्ण हेगड़े उत्तर कन्नड़ के हव्यक ब्राह्मण थे, जबकि उस समय कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों का वर्चस्व था. फिर भी 1983 में जब जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, तो वे सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री चुने गए और कर्नाटक के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने. यह घटना राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जिसने एकदलीय प्रभुत्व को तोड़ा और बहुदलीय व्यवस्था का रास्ता खोला.
हेगड़े पांच बार लगातार विधायक चुने गए (1957, 1962, 1967, 1983, 1985 और 1989). दो बार राज्यसभा सांसद भी रहे (1978-83 और 1996-2002). केंद्र सरकार में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री (1998-99) के रूप में भी उन्होंने सेवा दी. योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके हेगड़े ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लिया था और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल गए थे. काशी विद्यापीठ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने कानून की डिग्री ली. शुरुआती दिनों में कांग्रेस से जुड़े रहे, बाद में कांग्रेस (ओ) और फिर जनता पार्टी में शामिल हुए.
परिवार को विधान सौधा से रखा दूर
1983 में जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो पहला फरमान अपनी पत्नी शकुंतला और तीन बच्चों के लिए जारी किया. उन्होंने परिवार को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे अपनी जिंदगी सामान्य रूप से जिएं और विधान सौधा के पास न आएं या किसी अधिकारी से न मिलें. बेटी ममता निचाणी ने याद करते हुए बताया कि पिता ने घरवालों को बुलाकर कहा था कि आप सभी अपनी जिंदगी जीते रहेंगे और आप में से कोई भी विधान सौधा के पास नहीं आएगा.
यह घटना उनके मूल्य आधारित राजनीति के दृष्टिकोण को दर्शाती है. वे सत्ता को अस्थायी मानते थे और पद के दुरुपयोग से हमेशा दूर रहने का प्रयास करते थे.
प्रशासनिक सुधार और विकेंद्रीकरण
मुख्यमंत्री के रूप में उनके तीन कार्यकाल (1983 से 1988) यादगार रहे. उन्होंने त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था लागू की, जिसमें स्थानीय निकायों को वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां सौंपी गईं. कर्नाटक में महिलाओं के लिए स्थानीय निकायों में आरक्षण की शुरुआत भी उनके शासनकाल में हुई.
1984 में कर्नाटक लोकायुक्त की स्थापना कर जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया. उन्होंने वित्त मंत्री और मुख्यमंत्री के रूप में राज्य का बजट 13 बार पेश किया. 1984 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद उन्होंने नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दिया और 1985 में नए सिरे से जनादेश हासिल कर दोबारा मुख्यमंत्री बने.
हालांकि उनके कार्यकाल में कुछ विवाद भी रहे, जैसे अरक बॉटलिंग ठेकों और टेलीफोन टैपिंग के आरोप, जिनके कारण उन्होंने 1988 में इस्तीफा दे दिया. फिर भी उनके योगदान को विकेंद्रीकरण, संस्था निर्माण, सहकारी संघवाद और स्वच्छ राजनीति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है.
राष्ट्रीय राजनीति और अंतिम वर्ष
जनता दल में मतभेदों के बाद 1996 में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. उन्होंने राष्ट्रिय नव निर्माण वेदिके और बाद में लोक शक्ति पार्टी की स्थापना की, जो बाद में जनता दल (यूनाइटेड) में विलय हो गई. स्वास्थ्य खराब होने के कारण वे सक्रिय राजनीति से दूर होते गए और 12 जनवरी 2004 को बेंगलुरु में 77 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया.
आज उनकी जन्मशती पर बेंगलुरु में परिवार, पुराने साथी और प्रशंसक एकत्र हो रहे हैं. रामकृष्ण हेगड़े सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं थे. वे एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने सत्ता को साधन माना, साध्य नहीं. मूल्य आधारित राजनीति, संस्थाओं को मजबूत करने और परिवार को सत्ता से दूर रखने का उनका आदर्श आज भी प्रासंगिक है. उनकी 100वीं जयंती पर कर्नाटक और देश उन्हें ऐसे नेता के रूप में याद कर रहा है जिन्होंने राजनीति में सभ्यता और जवाबदेही का उदाहरण प्रस्तुत किया.
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-भारत एक्सप्रेस
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