लंबे समय तक दुनिया में यही माना जाता रहा कि पौधे सिर्फ जड़ें जमाए खड़े रहने वाले निर्जीव जीव हैं, जिन्हें बस पानी, मिट्टी और सूरज की रोशनी से जीवन मिलता है. लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में एक भारतीय वैज्ञानिक ने इस सोच को पूरी तरह हिला कर रख दिया. 10 मई 1901 का दिन विज्ञान के इतिहास में इसलिए खास बन गया, क्योंकि इसी दौर में यह साबित हुआ कि पौधे भी महसूस करते हैं और प्रतिक्रिया देते हैं.
भारतीय विज्ञान के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस को आधुनिक विज्ञान के अग्रदूतों में गिना जाता है. उन्होंने भौतिकी से लेकर जीव विज्ञान तक कई क्षेत्रों में ऐसे प्रयोग किए, जिन्होंने दुनिया की सोच बदल दी.
बोस ने एक बेहद संवेदनशील उपकरण बनाया, जिसे “क्रेस्कोग्राफ” कहा जाता है. इसकी मदद से वे पौधों की बहुत ही सूक्ष्म गतिविधियों को भी रिकॉर्ड कर सकते थे. उस समय यह अपने आप में एक क्रांतिकारी आविष्कार था, क्योंकि इससे पहले वैज्ञानिकों के पास इतनी बारीक निगरानी की कोई तकनीक नहीं थी.
पौधों की प्रतिक्रिया देखकर चौंक गई दुनिया
अपने प्रयोगों में बोस ने दिखाया कि जब किसी पौधे को गर्मी, रसायन, बिजली या चोट जैसी उत्तेजना दी जाती है, तो उसकी कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं और प्रतिक्रिया देती हैं. यह प्रतिक्रिया क्रेस्कोग्राफ में साफ दिखाई देती थी.
उन्होंने यह भी पाया कि पौधे सिर्फ बाहरी बदलाव पर ही नहीं, बल्कि अंदरूनी स्तर पर भी प्रतिक्रिया करते हैं. चाहे जड़ें हों, तना हो या पत्तियां हर हिस्से में सूक्ष्म हलचल दर्ज की जा सकती थी. उनके प्रयोगों ने यह साबित किया कि पौधे भी एक तरह से संवेदनशील जीवन जीते हैं.
वैज्ञानिक दुनिया में बड़ी बहस
बोस के इन निष्कर्षों ने उस समय की पश्चिमी वैज्ञानिक सोच को झकझोर दिया. पहले पौधों को केवल रासायनिक प्रक्रियाओं का हिस्सा माना जाता था, लेकिन उनके प्रयोगों के बाद यह मान्यता बदलने लगी. धीरे-धीरे वैज्ञानिक समुदाय ने स्वीकार किया कि पौधों में भी जीवन की गति, संवेदना और प्रतिक्रिया मौजूद होती है.
भारतीय सोच और आधुनिक विज्ञान का मेल
जगदीश चंद्र बोस का काम सिर्फ एक प्रयोग तक सीमित नहीं था, बल्कि यह भारतीय दर्शन की उस सोच को भी मजबूत करता है जिसमें प्रकृति को सजीव माना जाता है. उन्होंने विज्ञान और परंपरागत सोच के बीच एक पुल का काम किया.
आज जब “प्लांट न्यूरोबायोलॉजी” और “प्लांट इंटेलिजेंस” जैसे आधुनिक शोध क्षेत्र विकसित हो रहे हैं, तो उनकी नींव कहीं न कहीं बोस के उन्हीं प्रयोगों पर टिकी हुई है. उनकी खोज ने यह साबित किया कि विज्ञान केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति को समझने का एक जीवंत तरीका भी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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